मप्र : प्लास्टिक कचरा निपटान का भोपाल मॉडल अन्य नगरों में
भोपाल नगर निगम एक स्वयंसेवी संस्था से संबद्ध रैग पिकर्स की मदद से प्लास्टिक कचरे को सीमेंट संयंत्रों तक भेजता है, जहां ईंधन के तौर पर इसका इस्तेमाल होता है। प्लास्टिक कचरे से उत्पन्न होने वाली ऊर्जा परंपरागत साधनों से कहीं अधिक तापमान उत्सर्जित करती है।
नगर निगम ने जिस स्वयंसेवी संस्था को रैग पिकर्स के जरिए कचरा इकट्ठा करने की जिम्मेदारी सौंपी है वह रैग पिकर्स को प्लास्टिक कचरे का दो रुपये प्रति किलो के हिसाब से भुगतान करती है। संस्था इस कचरे को नगर निगम को सौंपती है। नगर निगम इस कचरे को कंप्रेस्ड कर सीमेंट कारखानों को भेजता है। कारखाने सीधे 'सार्थक' संस्था को तीन रुपये प्रति किलो के हिसाब से भुगतान करते हैं।
प्रमुख सचिव आवास एवं पर्यावरण आलेाक श्रीवास्तव ने विभागीय अधिकारियों को भोपाल मॉडल पर अमल के निर्देश दिए हैं। साथ ही नगरीय प्रशसन विभाग से अनुरोध किया है कि वह प्रदेश की सभी नगर निगम और आठ बड़ी नगर पालिकाओं में प्लास्टिक अपशिष्ट निपटान के लिए भोपाल मॉडल को स्वयंसेवी संस्थाओं के माध्यम से लागू करें। पर्यावरण विभाग इस काम के लिए पांच लाख से अधिक की आबादी वाले शहरों के लिए चयनित स्वयंसेवी संस्थाओं को 25 हजार और इससे कम आबादी के शहरों की संस्थाओं को 15 हजार रुपए देगी।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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