लामा की ममी को अब नष्ट कर रही है फफूंद
गेऊ (हिमाचल प्रदेश), 8 जुलाई (आईएएनएस)। प्राकृतिक रूप से 550 साल तक संरक्षित रही एक साधक की ममी को अब फफूंद से नुकसान हो रहा है। फफूंद लगने से इस ममी का वजन कुछ कम हो गया है। इस ममी को एक बौद्ध लामा साधक का शरीर मानने वाले लाहौल और साप्ती जिले के निवासी ममी को हो रहे नुकसान से काफी चिंतित हैं।
लाहौल के इस गांव गेऊ के लोगों का मानना है कि लामा साधक जब गहरे ध्यान की अवस्था में बैठे हुए थे तब बर्फ का पहाड़ खिसकने से उसमें दबने के कारण उनकी मौत हो गई।
ममी का रखरखाव कार्य कर रहे यहां के स्थानीय निवासी चिमित बोध ने आईएएनएस से कहा, "सरकार को इस ममी के संरक्षण के लिए प्रयास करना चाहिए। इस पर फफूंद लगने से इसे नुकसान हो रहा है। यहां तक कि इसका वजन भी कुछ कम हो चुका है।"
गेऊ , इंडो-तिब्बत सीमा पर 10,000 फुट की ऊंचाई पर शिमला से 340 किलोमीटर दूर स्थित है।
प्राकृतिक रूप से संरक्षित इस ममी पर शोध करने के लिए बड़ी संख्या में शोधकर्ता यहां आते हैं। पर्यटकों और शोधकर्ताओं की संख्या में तेज से हो रही वृद्धि के कारण भी ममी को नुकसान पहुंचा है।
एक शोधकर्ता ने मंदिर के विजिटर बुक में लिखा, "यह एक अद्भुत अनुभव है, भारत में यह एकदम अलग तरह की ममी है, इसकी कार्बन डेटिंग से पता चला है कि यह 15वीं शताब्दी की है।"
इस ममी की खोज इंडो-तिब्बत बार्डर पुलिस ने 1975 में एक भूकंप के बाद राहत कार्यो के दौरान की थी। यह ममी इस गांव में स्थित आठ स्तूपों में से एक में मिली जो कि भूकंप में बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए थे। इस ममी के दांत, नाखून और बाल भी सुरक्षित हैं।
चिमित बोध ने कहा कि यह देह ध्यान मुद्रा में बैठने की अवस्था में मिली थी। यह माना जाता है कि करीब 45 साल की उम्र के कोई लामा निर्वाण प्राप्त करने के लिए ध्यान कर रहे थे।
ममी का रखरखाव करने वाले एक अन्य व्यक्ति तारकेह बोध ने कहा, "निर्वाण के लिए ध्यान की अवस्था में शरीर तरल पदार्थ से रहित हो जाता है। इसलिए बिना किसी बाहरी संरक्षण के यह देह अब तक सुरक्षित रही है।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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