वृंदावन में मोर पंखों के व्यापार पर प्रतिबंध का विरोध

बृज खंडेलवाल

वृंदावन, 4 जुलाई (आईएएनएस)। देश के राष्ट्रीय पक्षी मोर को संरक्षण की आवश्यकता है लेकिन मोर पंखों के घरेलू व्यापार पर प्रस्तावित प्रतिबंध का दूसरा पहलू भी है।

भगवान कृष्ण की नगरी में मोर पंखों के उत्पादों को बेचकर अपनी जीविका कमाने वाले लोगों में मोर पंखों के घरेलू व्यापार पर प्रतिबंध के पर्यावरण और वन मंत्री के प्रस्ताव को लेकर चिंता है।

वृंदावन के कृष्ण मंदिर के सामने मोर पंखों से बने उत्पाद बेचने वाले हरि प्रसाद ने आईएएनएस से कहा, "क्या आप बिना मोर पंख के श्रीकृष्ण और राधा की कल्पना कर सकते हैं। दक्षिण में भगवान मुरुगन को मोर पसंद हैं। जैन मुनि इसका उपयोग करते हैं, पशु मालिकों को अपने पशुओं को सजाने के लिए इसकी आवश्यकता होती है। धार्मिक और सजावटी कारणों से मोर के पंखों की हमेशा मांग रहती है।"

गोवर्धन, मथुरा, वृंदावन और आगरा के हजारों कुटीर श्रमिकों ने पिछले एक सप्ताह से मंत्रालय के इस कदम के खिलाफ आवाज उठाते हुए विरोध प्रदर्शन आयोजित किए और ज्ञापन सौंपा।

श्रमिकों ने राष्ट्रपति को संबोधित एक ज्ञापन जिला अधिकारी को सौंपा।

अखिल भारतीय मोर पंख कुटीर उद्योग समिति के नंदलाल भारती ने आईएएनएस से कहा, "हमने उनसे इस कदम को खारिज करने का आग्रह किया।"

मथुरा के प्रसिद्ध द्वारिकाधीश मंदिर के पास सजावटी वस्तुएं बेचने वाले रमेश ने कहा कि मोर पंखों के व्यापार पर प्रतिबंध से कई लोगों का रोजगार छिन जाएगा। इनमें से अधिकांश गरीब लोग हैं।

अपनी आय खोने के खतरे का सामना कर रहे लोगों में शामिल लाखन सिंह ने कहा, "पंखों के लिए मोरों को मारे जाने का आरोप गलत है। हम उनको कैसे मार सकते हैं? वे हमको जीविका उपलब्ध कराती हैं।"

आगरा मोर पंखों का भारत का सबसे बड़ा थोक बाजार है।

एसोसिएशन के अध्यक्ष भंवर सिंह ने कहा कि वर्षा के बाद मोर अपने पंख गिराने लगते हैं और उनको इकट्ठा करके आगरा लाया जाता है। वास्तव में सितंबर-अक्टूबर के दौरान पूरे देश से मोर के पंख आगरा पहुंचते हैं।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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