विज्ञापन मामला : कार्यसमिति के रंग में भंग, गठबंधन में खटास (राउंडअप)
रंग में भंग ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और मोदी के बीच विकास और वोट की टकराहट को कड़वाहट में तब्दील कर दिया। इस विवाद ने सत्ताधारी भाजपा और जनता दल (युनाइटेड) में खटास भी पैदा कर दी।
बिहार विधानसभा चुनाव पर नजरें गड़ाकर सुबह जोशों खरोस व उत्साह से आरंभ हुई भाजपा की यह बैठक शाम ढलते-ढलते इस कदर कड़वी हो गई कि नीतीश ने कार्यसमिति में आए भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के सम्मान में आयोजित रात्रि भोज तक को स्थगित कर दी। पार्टी नेताओं को रात का भोजन होटल में ही करना पड़ा।
भाजपा की ओर से हालांकि यह दिखाने की कोशिश की गई कि रात्रिभोज नीतीश की ओर से नहीं बल्कि उसकी अपनी व्यस्तताओं के कारण रद्द किया गया। भाजपा प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन ने कहा कि जद (यू) के साथ उसका कोई विवाद नहीं है। वर्तमान विवाद स्वत: पैदा हुआ है। जद (यू) हमारी सबसे विश्वसनीय व पुरानी सहयोगी है।
विवाद की जड़ में 'विकास पुरुष और वोट' की राजनीति वाले विज्ञापन :
दरअसल यह विवाद आरंभ हुआ नरेंद्र मोदी के महिमा वाले अखबार में छपे कुछ विज्ञापनों से। एक विज्ञापन में मोदी और नीतीश को साथ-साथ दिखाया गया है तो गुजरात में रह रहे बिहारियों की ओर से जारी एक अन्य विज्ञापन के जरिए मोदी को बिहार की जनता के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ने की कोशिश करते दिखाया गया है।
इसमें लिखा गया है कि गुजरात और बिहार का बहुत पुराना संबंध रहा है। यही नहीं, इस विज्ञापन के जरिए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के विकास माडल पर मोदी के मॉडल को भारी पड़ते दिखाया गया है। विज्ञापन में कहा गया है, "संकट की घड़ी में गुजरात हमेशा बिहार के साथ खड़ा रहा है। कोसी नदी में 2008 में आई बाढ़ के दौरान भी गुजरात ने बिहार को सर्वाधिक मदद दी।"
अपनी छवि को लेकर हमेशा सजग रहने वाले नीतीश के भड़कने के लिए यह काफी था। नीतीश मोदी पर जमकर बिफरे भी। उन्होंने एक विज्ञापन के मामले में इसे जारी करने वाले के खिलाफ कानूनी कार्रवाई तक की धमकी दे डाली।
उन्होंने कहा, "यह विज्ञापन देखकर मैं दंग रह गया। हम तो विज्ञापन जारी करने वाले के खिलाफ कानूनी नोटिस जारी करेंगे। जिसने इसे जारी किया है उसे सामने आना चाहिए।"
उन्होंने कहा, "इस विज्ञापन में मेरे फोटोग्राफ का इस्तेमाल किया गया है। इससे मुझे और मेरे कार्यालय को भी अवगत नहीं कराया गया।"
बिहार में मोदी का क्या काम :
नीतीट मोदी पर इस कदर खफा हुए कि उन्होंने न सिर्फ कोसी राहत की राशि लौटाने की बात कही बल्कि उन्हें संस्कृति का पाठ तक पढाया। मोदी पर बरसते हुए नीतीश ने कहा, "बिहार से मोदी का क्या मतलब है। हम सरकार चला रहे हैं बिहार भाजपा के साथ। यहां हमारी मिली जुली सरकार विकास का काम कर रही है। कुछ लोगों की आंखों में यह गड़ रहा है।"
उन्होंने मोदी से साफ -साफ कहा कि वह गुजरात के मुख्यमंत्री है, बिहार में उनका क्या काम है। नीतीश के गुस्से का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने यहां तक कह दिया कि कोसी राहत कोष में गुजरात की ओर से दी गई राशि तक वह लौटा देंगे।
इस विज्ञापन पर भड़के नीतीश ने कहा, "हम पता करवा रहे हैं कि मुख्यमंत्री राहत कोष से गुजरात से आई राशि खर्च हुई है कि नहीं। खर्च नहीं हुई होगी तो हम उसे लौटा देंगे।" उन्होंने कहा कि यह भारतीय संस्कृति नहीं है कि कोई सहायता भी भेजे और ढिंढोरा भी पीटे। यह हमारी संस्कृति के प्रतिकूल है। नीतीश ने कहा बिहार कमजोर नहीं है यहां के लोगों में इतनी ताकत है कि अपनी जरूरत के समय वह सक्षमता के साथ मुकाबला कर सकते हैं।
बिहारी बाबू का गुस्सा फूटा, यशवंत, हेमा ने दिखाई नाराजगी
राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक में बैठक में परोक्ष रूप से राज्यसभा उम्मीदवारी के मुद्दे ने भी अपना असर दिखाया। बिहारी बाबू के नाम से मशहूर सिने अभिनेता व पूर्व केंद्रीय मंत्री शत्रुघ्न सिन्हा नाराजगी की वजह से बैठक में घंटे देर से पहुंचे।
इससे पहले उन्होंने संवाददाताओं से बातचीत में कहा, "कार्यसमिति पटना में हो रही है और मुझे इसके मद्देनजर कोई जिम्मेदारी भी नहीं दी गई है। बड़े से बड़े नेता इसमें लगे हुए हैं। संभवत: मेरी जरूरत नहीं समझी गई। स्वाभिमान रैली के लिए मुझे बुलाया नहीं गया है इसलिए मेरा जाना उचित नहीं होगा, मैं नहीं जाउंगा।"
सिन्हा ने इसके साथ ही पार्टी की आंतरिक स्थिति पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि भाजपा अध्यक्ष गडकरी को स्वतंत्र रूप से पार्टी में फैसला नहीं लेने दिया जा रहा है।
बैठक में यशवंत सिन्हा, किरण खेर, हेमा मालिनी का नहीं पहुंचना भी विवादों में रहा। बताया जाता है कि सभी राज्यसभा उम्मीदवारी के मसले पर नाराज हैं। स्मृति ईरानी बैठक में पहुंची लेकिन शाम में।
वरिष्ठ वकील राम जेठमलानी को राजस्थान से राज्यसभा का उम्मीदवार बनाए जाने को लेकर उठे विवाद की छाया भी कार्यसमिति बैठक में दिखी।
सूत्रों के मुताबिक जेठमलानी को राजस्थान से राज्यसभा का उम्मीदवार बनाए जाने को लेकर पार्टी की राज्य इकाई में हो रहे विरोध के मद्देनजर पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सहित राज्य के आधे दर्जन वरिष्ठ नेताओं को कार्यसमिति में न आने की सलाह दी गई है।
कार्यसमिति के एक सदस्य के मुताबिक वसुंधरा, पूर्व प्रदेष अध्यक्ष ओम माथुर, रामदास अग्रवाल, प्रदेश अध्यक्ष अरुण चतुर्वेदी, घनश्याम तिवाड़ी और गुलाब चंद्र कटारिया को कार्यसमिति से दूर रहने की सलाह दी गई है। कार्यसमिति में राजस्थान की ओर से शामिल होने वाले नेताओं में किरण माहेश्वरी, सुनील भार्गव, महेश शर्मा और मानवेंद्र सिंह प्रमुख हैं।
चतुर्वेदी ने आईएएनएस से फोन पर बातचीत में कहा कि कुछ लोग बैठक में हिस्सा नहीं लेने जा रहे हैं क्योंकि राज्यसभा चुनाव में वह फंसे हुए हैं।
उल्लेखनीय है कि पार्टी ने तमाम विरोधों के बावजूद जेठमलानी को राज्यसभा का उम्मीदवार बनाया है। पार्टी के केंद्रीय नेताओं के साथ प्रदेश इकाई भी इसके विरोध में है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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