बाल मजदूरों के लिए कुछ नहीं बदला (जून 12, बाल श्रम विरोधी दिवस पर विशेष )
स्वयंसेवी संगठनों द्वारा बाल श्रम का लाख विरोध किए जाने के बावजूद इससे संबंधित कानूनों के लागू नहीं हो पाने से बाल श्रमिकों की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आ रहा है।
आठ साल का सनी दक्षिण दिल्ली में एक चाय की दुकान पर काम करता है, ग्राहकों को चाय देने के अलावा बर्तन धोता है, शनि ने कहा, "मुझे नहीं पता कि बाल श्रम दिवस का क्या मतलब है, हां मैं स्कूल जाना चाहता हूं लेकिन मेरे पिता बीमार हैं इसलिए काम पर नहीं जा सकते। इसलिए मुझे यहां काम करना पड़ता है।"
मोती बाग के चौराहे पर फूल बेचने वाली दुर्गा ने कहा कि उसे अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए यह काम करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।
उसने कहा, "मुझे नहीं पता कि काम करने वाले बच्चों के लिए कोई कानून है, मेरे साथ 14 साल से कम उम्र के पांच बच्चे और हैं, हम सब साथ ही काम करते हैं अगर हम काम नहीं करें तो हमें भूखे रहना पड़ेगा।"
दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में बिहार, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश से दुकानों, होटलों पर काम करने के लिए आते हैं।
सात साल का सलीम को एक दलाल शिक्षा दिलाने के बहाने बिहार से दिल्ली लेकर आया है, उसने कहा, "मुझे यहां लाने वाले अंकल ने मेरे माता-पिता को कहा था कि वह मुझे स्कूल भेजेंगे और कुछ हल्का काम करवाएंगे ताकि मैं कुछ पैसे घर भेज सकूं।"
स्वयंसेवी संगठन बचपन बचाओं आंदोलन (बीबीए) द्वारा इसे छुडाने के बाद उसने कहा, "शुरुआत में दिल्ली में एक कपड़े की छोटी फैक्टरी में कढ़ाई का काम करता था वहां सिर्फ एक कमरे की जगह थी छह लड़के प्रतिदिन 14 घंटे काम करते थे और पैसा या तो नहीं मिलता था या बहुत कम मिलता था।"
बीबीए के उमेश गुप्ता ने कहा, "इन बच्चों का कानून के तहत पुनर्वास करने के लिए हर बच्चे पर 20 हजार रुपये खर्च किए जाएंगे।"
बच्चों को होटलों और घरेलू मदद के कार्यो में लगाने से रोकने के लिए बाल श्रम (रोकथाम एवं नियंत्रण) कानून वर्ष 2006 में लागू किया गया था
सरकारी अनुमान के मुताबिक करीब 1 करोड़ 26 लाख बच्चे देश में मजदूरी कर रहे हैं हालांकि स्वयंसेवी संगठनों के आंकलन के मुताबिक इनकी संख्या 6 करोड़ है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
**












Click it and Unblock the Notifications