जाति आधारित जनगणना भाजपा के गले की फांस
नई दिल्ली, 2 जून (आईएएनएस)। जाति आधारित जनगणना भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए गले की फांस बन गया है। पार्टी ने भले ही सार्वजनिक तौर पर इसका समर्थन किया हो लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और पार्टी के एक बड़े धड़े खासकर अगड़ी जाति के नेताओं द्वारा इसके विरोध में स्वर मुखर करने के बाद इस मुद्दे पर पार्टी के लिए किसी निर्णय पर पहुंचना आसान नहीं रहा।
लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से संसद के पिछले सत्र में जनगणना में जाति का कॉलम डालने का आग्रह किया था जिसके जवाब में प्रधानमंत्री ने आश्वासन दिया था कि मंत्रिमंडल की बैठक में इसमें विचार किया जा सकता है। मंत्रिमंडल की बैठक में इस मुद्दे को मंत्रियों की उच्चाधिकार प्राप्त समिति के हवाले कर दिया गया है।
भाजपा में जाति आधारित जनगणना को लेकर जिस प्रकार का द्वंद्व सामने आ रहा है ठीक उसी प्रकार का द्वंद्व मंडल आयोग के समय भी उसमें था। मंडल आयोग पर धड़ों में बंटी पार्टी के लिए सार्वजनिक तौर पर इसका विरोध पैर पर कुल्हाड़ी मारने के समान था।
अलबत्ता पार्टी ने इसका समर्थन तो किया लेकिन इसकी भरपाई के लिए पार्टी के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या तक राम-रथ यात्रा निकाली तथा 'जाति से तोड़ेंगे और संस्कति से जोड़ेंगे' का नारा बुलंद किया। इसी के दम पर पार्टी ने सिफर से शिखर तक का रास्ता तय किया और वह अगड़ों के साथ-साथ अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की भी पार्टी बन गई।
आज भाजपा का सबसे बड़े वोटवैंक भी यही हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, कर्नाटक के मुख्यमंत्री बी. एस. येदियुरप्पा और बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी भी ओबीसी से ही आते हैं। भाजपा यदि जाति आधारित जनगणना का विरोध करती है तो ऐसे में उसे ओबीसी वर्ग की नाराजगी का भारी खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।
भाजपा की दूसरी मुसीबत यह है कि संघ जाति आधारित जनगणना के पक्ष में नहीं है। संघ की सोच राष्ट्रवादी है और उसे लगता है कि यदि जाति आधारित जनगणना हुई तो उसके राष्ट्रवादी अभियान को इससे झटका लगेगा। ऐसे में संघ की नाराजगी झेलना भाजपा के लिए आसान नहीं होगा।
संघ के मुखपत्र पांचजन्य के ताजा अंक में छपे एक संपादकीय में इसका खुलकर विरोध भी किया गया है। संपादकीय में लिखा गया है, "स्वतंत्र भारत में हमारे संविधान निर्माताओं ने तो हमारे सांस्कृतिक चिंतन के आधार पर जातिविहिन समाज का लक्ष्य सामने रखा। इसलिए जाति आधारित जनगणना की बात करना हमारे सामाजिक ताने-बाने को तो ध्वस्त करने की कोशिश है ही, यह संविधान की मूल भावना के प्रतिकूल भी है।"
भाजपा के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी ने भी हाल ही में जाति आधारित जनगणना के विरोध में अपना मंतव्य दिया था। भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी, राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली भी इसी मत के बताए जाते हैं।
राजनीतिक विश्लेषक जी. वी. एल. नरसिम्हाराव का मानना है, "भाजपा के लिए ओबीसी महत्वपूर्ण समूह है और हो सकता है कि उसके ऊपर जाति आधारित जनगणना को लेकर दबाव हो लेकिन मेरा मानना है कि इसे राजनीतिक दलों के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। जिस प्रकार जनगणना से अल्पसंख्यकों, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों की संख्या सामने आती है, उसी प्रकार ओबीसी वर्ग की संख्या गिनने में कोई खराबी नहीं है। लेकिन इससे हर जाति में खुद को नजरअंदाज किए जाने का भाव आएगा जो कि सामाजिक ताने-बाने को तोड़ सकता है।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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