झारखण्ड में किसी मुख्यमंत्री ने पूरा नहीं किया कार्यकाल
राज्य में कोई भी मुख्यमंत्री 28 महीने से ज्यादा समय तक मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नहीं बैठ पाया है। यह बात दीगर है कि मतदाताओं ने भी विधानसभा चुनाव में अब तक किसी एक दल को बहुमत नहीं दिया है।
राज्य बनने के बाद 15 नवंबर 2000 को भारताय जनता पार्टी (भाजपा) के बाबूलाल मरांडी राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने। लेकिन राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के ही कुछ विधायकों के विरोध के कारण उन्हें 28 महीने में ही मुख्यमंत्री की कुर्सी गंवानी पड़ी। इसके बाद 18 मार्च 2003 को अर्जुन मुंडा को मुख्यमंत्री बनाया गया।
वर्ष 2005 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा को जनादेश नहीं मिला। साथ ही किसी दल को बहुमत भी नहीं मिला। कई दलों के सहयोग से दो मार्च 2005 को शिबू सोरेन मुख्यमंत्री बने, लेकिन नौ दिनों में ही इनकी सरकार चली गई। इसके बाद 12 मार्च को अर्जुन मुंडा ने एक बार फिर झारखण्ड की बागडोर संभाली, लेकिन 18 महीनों के बाद ही उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ी।
एक बार फिर झारखण्ड की राजनीति में बदलाव आया और 18 सितंबर 2006 को निर्दलीय विधायक मधु कोड़ा को राज्य का दायित्व सौंपा गया। लेकिन वह भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए और 23 महीने के बाद उनके हाथ से बागडोर फिसल गई।
एक बार फिर से शिबू सोरेन के हाथ में सत्ता की बागडोर आई, लेकिन चार महीने में ही उनके तमाड़ विधानसभा क्षेत्र से चुनाव हार जाने के कारण उनकी सरकार गिर गई। इसके बाद किसी भी गठबंधन की सरकार नहीं बनने की स्थिति में 19 जनवरी 2009 को राज्य में राष्ट्रपति शासन लग गया।
इसके बाद वर्ष 2009 के नवंबर-दिसंबर महीने में राज्य में विधानसभा चुनाव हुआ, लेकिन एकबार फिर मतदाताओं ने किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं दिया। फिर भी तालमेल कर झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष शिबू सोरेन ने 30 दिसंबर 2009 को मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाल ली।
अभी पांच माह ही गुजरे थे कि सहयोगी दल की भूमिका निभा रहे भाजपा ने सरकार से समर्थन वापस लेने की घोषणा कर दी और शिबू सोरेन को त्यागपत्र देना पड़ा। अब देखना है कि झारखण्ड का अगला मुख्यमंत्री कौन होता है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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