'जरदारी राष्ट्रपति बने, तो मैं कांप उठी..'

जरदारी पर फातिमा के पिता और बेनजीर के भाई मुर्तजा भुट्टो की हत्या की साजिश रचने का आरोप था। जरदारी हालांकि बाद में इस आरोप से बरी हो गए थे।

फातिमा ने हाल ही में प्रकाशित अपनी पुस्तक 'सांग्स ऑफ ब्लड एंड सोर्ड' में लिखा है, "20 सितम्बर 2008 को पापा की 12वीं बरसी पर, जरदारी ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति पद की शपथ ली। शपथ ग्रहण एक दिन पहले 19 तारीख को होना था लेकिन नए राष्ट्रपति के हुक्म पर उसे एक दिन टालकर शनिवार को कर दिया गया। यह हमारे लिए बड़ा दिन था, पापा की बरसी थी।"

फातिमा लिखती हैं, "जब वह (जरदारी) संसद के समक्ष खड़े हुए, जिसने उन्हें सर्वसम्मति से राष्ट्रपति चुना था (उसी लोकतांत्रिक ढंग से, जिस ढंग से मुशर्रफ राष्ट्रपति निर्वाचित हुए थे), तो उन्होंने अपने भाषण के बीच सभी से अपने साले की बरसी के मद्देनजर कुछ देर मौन रखने को कहा। मैं कांप उठी। यह बिल्कुल ऐसा था, जैसे वह हम पर व्यंग्य कर रहे थे।"

"उसके बाद जो कुछ हुआ उसकी तुलना नहीं की जा सकती। पाकिस्तान के राष्ट्रपति के रूप में अपने पहले ही दिन जरदारी ने शोएब सुडल को सम्मानित किया। वह उन वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों में थे, जो मेरे पिता की हत्या के दौरान मौके पर मौजूद थे। सुडल को 'हिलाल-ए-इम्तियाज' से नवाजा गया, यह पदक पाकिस्तान की जनता की सेवा करने वाले के सम्मान में दिया जाता है। उसके बाद उन्हें फेडरल इंवेस्टीगेशन ब्यूरो का प्रमुख बनाया गया।"

मुर्तजा 20 सितम्बर 1996 को कराची में अपने आवास के समीप पुलिस के साथ मुठभेड़ में मारे गए थे। उस समय फातिमा की उम्र 14 साल थी। तीन दिसंबर 2009 को कराची की एक अदालत ने 20 पुलिसकर्मियों को कत्ल के आरोप से बरी कर दिया था।

वर्ष 1996 में बेनजीर सरकार की बर्खास्तगी के बाद मुर्तजा की हत्या में हाथ होने के आरोप में जरदारी को बंदी बना लिया गया था। इस मामले में कभी कोई आरोप साबित नहीं किया जा सका क्योंकि मुर्तजा के कत्ल वाले स्थान को पुलिस जांचकर्ताओं के मौके पर पहुंचने से पहले ही धुलवा दिया गया था।

जरदारी के प्रभुत्व को देखते हुए फातिमा को अपने छोटे भाई जुल्फी को बाहर भेजना पड़ा। अप्रैल 2009 को फातिमा ने लिखा, "जब मैंने यह किताब खत्म की तो ऐसा लगा जैसे मेरे इर्द-गिर्द का सबकुछ धीरे-धीरे खत्म हो रहा है। जब मैंने अपने पिता की मौत के बारे में लिखा, तो एक खास किस्म का पूर्वानुभव था। यह खतरा उसी तरह का था, एक अहसास था कि हम लोग यहां महफूज नहीं हैं। सात महीने पहले मैंने अपना सामान बांधा और अपने भाई को किसी दूसरे मुल्क में छोड़ आई। ..2008 की बसंत में जुल्फी 18 बरस हो गया था और वह बखूबी जानता था कि आसिफ जरदारी द्वारा खुद को हमारे पिता के कत्ल के मामले से बरी करा लेने से हम बहुत संकट की स्थिति में थे। वह जानता था कि जो शख्स अब पाकिस्तान का राष्ट्रपति कहलाता है उसके साथ हमारा अतीत होने की वजह से हम अपने ही मुल्क में महफूज नहीं रह गए थे।"

फातिमा के अनुसार, "जब जरदारी ने खुद को राष्ट्रपति पद के लिए पीपीपी के सर्वसम्मति से निर्वाचित उम्मीदवार के रूप में पेश किया तो हम जानते थे कि कोई भी उन्हें सत्ता के शीर्ष तक पहुंचने से नहीं रोक पाएगा। उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद वह पाकिस्तान पर शासन करने वाले थे। हमने जुल्फी को मुल्क से बाहर भेजने का फैसला किया। हम इस फैसले को टालते आ रहे थे।

..लेकिन जुल्फी भुट्टो खानदान का इकलौता पुरुष वारिस है। हम उसे असुरक्षित छोड़ने का जोखिम नहीं ले सकते थे। जुल्फि के अलावा भुट्टो परिवार के वारिसों में सासी और मैं हूं। हम ऐसे मुल्क में नहीं रहते जहां स्वतंत्र न्यायपालिका हो-या कहिए कि न्यायपालिका ही न हो।"

भुट्टो परिवार पिछले चार दशक से हिंसा का शिकार होता आया है। फातिमा के दादा और पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भट्टो को फांसी दे दी गई थी। फातिमा के चाचा शाहनवाज 18 जुलाई 1985 को फ्रांस के नाइस में एक होटल में रहस्यमय हालात में मृत मिले थे। भुट्टो परिवार को यकीन है कि उन्हें जहर देकर मारा गया था।

फातिमा के पिता मुर्तजा 20 सितम्बर 1996 को पुलिस मुठभेड़ में मारे गए थे और उनकी बुआ तथा पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो की 27 दिसंबर 2007 को हत्या हो गई थी।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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