विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए दरवाज़े खुले

भारत सरकार ने विदेशी विश्वविद्यालयों को देश में अपनी शाखा खोलने और शिक्षा देने की योजना को स्वकृति दे दी है.
फ़िलहाल कैबिनेट ने इस विधेयक को स्वीकृति दी है और अब इसे संसद के अनुमोदन की आवश्यकता है.
अगर ये विधेयक संसद से मंज़ूर हो जाता है तो इससे उन छात्रों को लाभ होगा जो विदेशों में शिक्षा लेने को तरजीह देते हैं.
इस विधेयक का कुछ राजनीतिक पार्टियां वर्षों से विरोध करती आईं हैं और उनका कहना है कि इसका केवल उन धनी भारतीयों को फ़ायदा होगा जो अधिक फ़ीस देने की क्षमता रखते हैं.
भारत सरकार के इस क़दम को शिक्षा प्रणाली में सुधार के तौर पर देखा जा रहा है, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि देश में योग्य स्नातकों की कमी है.
सरकार के इस फ़ैसले के बाद जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के उपकुलपति बीबी भट्टाचार्य ने कहा, "भारत में पहले ही से कई विदेशी यूनिवर्सिटियाँ कुछ विश्वविद्यालयों से अनुबंध करके कुछ विषयों में डिग्रियां दे रहीं थीं और अब इस स्वकृति से एक अनौपचारिक सिलसिले को औपचारिकता मिल जाएगी."
उनका कहना था कि इस समय शिक्षा एक ग्लोबल गतिविधि है और ऐसा होना स्वाभाविक है.
इस के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए भट्टाचार्य ने कहा, "अगर जानी-मानी यूनिवर्सिटियाँ भारत में आती हैं तो इसका अच्छा प्रभाव होगा. इससे शोध का स्तर बढ़ेगा साथ ही भारत के अच्छे विश्वविद्यालयों में प्रतिस्पर्धा भी बढ़ेगी."
उन्होंने कहा कि इस समय भारत के छात्र बड़ी तादाद में ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड जैसे देशों में पढ़ाई करने के लिए जाते हैं और मामूली यूनिवर्सिटियों में पढ़ते हैं.
बीबी भट्टाचार्य के अनुसार वैसी यूनिवर्सिटियों की शाखा यहां खुलती है तो इससे वहाँ जाने वाले छात्रों का ख़र्च कम होगा, इसके अलावा कोई बड़ा फ़ायदा नहीं होगा.
उनका कहना था कि इसका एक ख़तरा भी है जिसकी संभावना भी दिख रही है कि कुछ विदेशी यूनिवर्सिटियाँ भारत में अपने ब्रांड का अधिक ख़्याल रखेंगी लेकिन वो अपने अंतरराष्ट्रीय स्तर का ख़्याल नहीं रखेंगे. इससे भारत को नुक़सान हो सकता है.












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