रेल बजट पर आम लोगों की राय

आइए देखते हैं भारत के अलग-अलग राज्यों में आम लोग रेल बजट के बारे में क्या सोचते हैं.
कमल, सब्ज़ी विक्रेता, लखनऊः
हर चीज़ महंगी हो गई है. रेल पर सवार होने के लिए बहुत पैसे ख़र्च करने पड़ते हैं. ममता हों या लालू, सब एक ही जैसे हैं. हम लोगों की सुध कौन लेता है. हम तो जनरल क्लास में चढ़ते हैं, सीट लकड़ी की हो या गद्दे की कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. कभी-कभी तो फ़र्श पर भी बैठना पड़ता है.
दिलीप कुमार श्रीवास्तव, पटनाः
रेल बजट में बिहार के साथ बेइंसाफी वाला अपना पुराना रवैया रेल मंत्री ममता बनर्जी ने इसबार भी क़ायम रखा है. सिर्फ दरभंगा से मुंबई के बीच एक नयी ट्रेन और दो-तीन कम दूरी की मामूली यात्री ट्रेन इस राज्य में दे कर उन्होंने यहाँ की बांकी लंबित बड़ी -बड़ी रेल परियोजनाओं को लगता है ठण्डे बस्ते में डाल दिया है. मधेपुरा और मढ़ौरा के पहले से प्रस्तावित रेल कारखाने का भी उन्होंने इतना ही ज़िक्र किया कि वो भी बनेगा. ये तो उपेक्षा की हद हो गयी. अब बिहार के लोगों को पता चल रहा होगा कि केंद्र सरकार में इस राज्य का एक भी मंत्री नहीं रहने का कितना नुकसान बिहारियों को उठाना पड़ रहा है.
मीनाक्षी जाफ़र, शोरूम की मालकिन, लखनऊः
रेल बजट इस हिसाब से अच्छा है कि ममता दीदी ने किराए नहीं बढ़ाए. हालाँकि मैं विमान में यात्रा करना ज़्यादा पसंद करती हूँ क्योंकि उससे समय बचता है और कहीं-कहीं तो विमान का किराया रेल के किराए से कम ही है. कैंसर के रोगियों को किराए में छूट दी गई, यह एक अच्छा क़दम है.
पूर्णिमा, शिक्षिका, पटना विश्वविद्यालय, पटना
बिहार को रेल मंत्री ममता बनर्जी से बहुत उम्मीद भी नहीं थी. लेकिन इस पिछड़े राज्य में रेल सेवा के विस्तार से जुड़ी हुई जो पहले से चली आ रही योजनाओं को एक-डेढ़ साल से शिथिल कर दिया गया है, उस पर भी ममता जी की चुप्पी, निराशाजनक ही नहीं, आपत्तिजनक है. यात्री भाड़ा या माल भाड़ा नहीं बढ़ाने के पीछे उनकी बंगाल-राजनीति हो या ना हो, लेकिन लालू जी से दूरी और नीतीश जी से नजदीकी दिखाने वाली उनकी राजनीति यहाँ सबको समझमें आ गई है. अब जब बिहार को ठेंगा दिखा दिया गया है, तब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार क्या कहते हैं, ये जानना दिलचस्प होगा.
नवल किशोर, निजी क्षेत्र के कर्मचारी, राँची
मैं इस रेल बजट से निराश हूँ. ऐसा लगता है की इस बजेट में सिर्फ बंगाल और मुंबई के लोगों को ध्यान में रखा गया है. न तो इसमें बिहार के लिए कुछ है और न ही झारखंड के लिए. आज भी दक्षिण भारत के लिए रांची से मात्र एक ट्रेन है जबकि राजस्थान, मुंबई और गुजरात के लिए भी ट्रेनों की मांग की अनदेखी की गयी है. ममता बनर्जी नें यह रेल बजेट सिर्फ बंगाल में अपने राजनीतिक फायदे को देख कर पेश किया है. बिहार के प्रति उनकी खुन्नस इस बजेट में साफ़ झलकती है. माना के ममता बनर्जी नें माल और यात्री भाड़ा नहीं बढ़ाया है मगर उन्होंने सिर्फ बड़े शहरों को ही अपने ध्यान में रखा है. उन्होंने छोटे राज्यों की उपेक्षा की है.
( उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड से बीबीसी संवाददाताओं के भेजे विवरण पर आधारित)












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