अगले सौ वर्षो में लुप्त हो जाएंगी दुनिया की 90 फीसदी भाषाएं !

इस रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि पूरी दुनिया में मूल निवासियों यानी देसी लोगों में गरीबी, स्वास्थ्य समस्याओं, अपराध और मानवाधिकार उल्लंघन की दर आनुपातिक रूप से बहुत ऊंची है। गुरुवार को जारी इस रिपोर्ट में कहा गया है, "दुनिया में 6,000 से 7,000 मौखिक भाषाएं हैं। दुनिया की करीब 97 फीसदी आबादी इनमें से 4 फीसदी भाषाएं बोलती है, जबकि शेष 96 फीसदी भाषाएं बोलने वाले लोगों की तादाद महज तीन फीसदी है। इनमें से अधिकांश भाषाओं के लुप्त हो जाने का खतरा है।" इसमें कहा गया है कि अगले 100 वर्षों में करीब 90 फीसदी भाषाएं पूरी तरह दम तोड़ सकती हैं।

इन भाषाओं के लुप्त होते जाने की प्रमुख वजह है एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक इन भाषाओं का संचरण नहीं होना और ऐसी भाषाओं को पुनर्जीवित करने के लिए सरकार द्वारा अपेक्षित कदम नहीं उठाया जाना। रिपोर्ट मूल निवासियों की दयनीय सामाजिक-आर्थिक स्थिति का भी खुलासा करती है।

इसमें कहा गया है, "पूरी दुनिया में मूल निवासियों में से 50 फीसदी वयस्क टाइप 2 मधुमेह की चपेट में हैं और यह संख्या बढ़ सकती है। यूं तो दुनिया की आबादी में मूल निवासियों की तादाद महज करीब 37 करोड़ यानी 5 फीसदी ही है, लेकिन दुनिया के 90 करोड़ बेहद गरीब ग्रामीणों में उनकी भागीदारी करीब एक तिहाई है। पौष्टिक आहार की कमी और स्वास्थ्य सुविधाओं व संसाधनों तक सीमित पहुंच के कारण उनकी जीवन प्रत्याशा गैर मूल निवासियों की जीवन प्रत्याशा से 20 वर्ष कम है।"

मूल निवासियों से मतलब ऐसे लोगों के जातीय समूह से है जो ऐसे भौगोलिक क्षेत्र में निवास करते हों जिनसे उनका पहले से ऐतिहासिक जुड़ाव रहा हो। इसके दायरे में ऐसे लोग भी आते हैं जो बाद में बड़े पैमाने पर उस क्षेत्र में जाकर रच-बस गए।

रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया के किसी भी हिस्से में मूल निवासियों के लिए सबसे बड़े खतरों में से एक है विस्थापन। रिपोर्ट में कहा गया है, "जब कभी ये लोग अपने अधिकारों को लेकर मुखर होते हैं (विस्थापन के दौरान), उनका शारीरिक उत्पीड़न, शोषण होने लगता है। यहां तक कि उनकी मौत भी हो जाती है।" रिपोर्ट में मलेशिया, इंडोनेशिया, थाइलैंड, हवाई, रवांडा, कोलंबिया और कांगो में ऐसी वारदातें होने की चर्चा है।

रिपोर्ट कहती है कि जलवायु परिवर्तन मूल निवासियों के अस्तित्व को खतरा पहुंचा रहा है, क्योंकि इसके सामाजिक-आर्थिक दुष्परिणाम उन्हें प्रभावित कर रहे हैं।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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