बैंक कर्मी हड़ताल पर रहे, मगर एटीएम देते रहे नकदी (राउंडअप)
हड़ताल का आह्वान अखिल भारतीय बैंक कर्मचारी संघ (एआईबीईए) और अखिल भारतीय बैंक अधिकारी संघ (एआईबीओए) ने किया था। मंगलवार को उनकी सरकार के साथ बातचीत विफल हो गई थी।
बेंगलुरू में एआईबीओए के एक वरिष्ठ पदाधिकारी बालकृष्ण शेट्टी ने कहा, "हमारी हड़ताल स्टेट बैंक ऑफ इंदौर के उसके मूल बैंक में प्रस्तावित विलय के विरोध में है। लेकिन हम सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के विलय और उनके समेकन का भी विरोध करते हैं।"
एआईबीईए के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजन नागर ने आईएएनएस को कोलकाता से फोन पर बताया, "बैंकों का विलय राष्ट्र हित में नहीं है। इससे न केवल नौकरियों में कमी आएगी बल्कि इससे छोटे उपभोक्ताओं जैसे कृषि व्यापारी और छोटे व मझोले उद्यमियों के लिए बैंकिंग सेवाएं प्रभावित होंगी।"
नागर ने कहा, "27 सार्वजनिक बैंकों और करीब इतने ही निजी बैंकों ने हड़ताल में हिस्सा लिया।" उन्होंने कहा कि वे सार्वजनिक बैंकों का विस्तार चाहते हैं न कि विलय।
देश के कई शहरों में हालांकि बैंक खुले रहे लेकिन उपभोक्ताओं से जुड़े काम-काम ठप रहे। मुद्रा बाजार में कामकाज सामान्य रहा।
चेन्नई से राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली और कोलकाता से मुंबई तक बैंकों के एटीएम के बाहर लोगों की लंबी कतारें देखी गईं।
यह मामला संसद में भी उठाया गया, जहां विपक्षी पार्टियों ने कहा कि यदि सरकार उनकी मांगों को नहीं मानती तो मजदूर संगठन अपना आंदोलन तेज करने के लिए बाध्य होंगे।
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के राज्यसभा सदस्य तपन सेन ने कहा, "बैंकों के विलय के खिलाफ और आउटसोर्सिग के जरिए निजीकरण के लिए पिछले दरवाजे से उठाए गए कदम के खिलाफ हड़ताल की गई है।"
सेन ने श्रम कानूनों को ठीक से लागू करने और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों तथा सरकार द्वारा संचालित उद्यमों के निजीकरण के लिए उठाए गए कदमों को वापस लेने की भी मांग की। इसके साथ ही उन्होंने असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा की भी मांग की।
अगस्त में 10 लाख से अधिक बैंक कर्मचारी बेहतर पेंशन और वेतन की मांग को लेकर दो दिवसीय हड़ताल पर चले गए थे, जिसके कारण उपभोक्ताओं को काफी परेशानी हुई थी।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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