कुपोषण छीन रहा है नौनिहालों से जिंदगी

भोपाल, 12 दिसंबर (आईएएनएस)। उम्र 12 माह, नाम दीपक और शरीर लगभग कंकाल में बदला हुआ। इतना ही नहीं उपहार में मिली कुपोषण की बीमारी से उसकी आंखों की रोशनी तक समाप्त हो चली है।

दीपक जैसे न जाने कितने बच्चे हैं रीवा जिले के जवा विकासखण्ड के गांवों में, जिन्होंने अभी दुनिया को जाना तक नहीं है और बीमारी उनकी जिंदगी छीनने को सिर पर सवार है।

जवा विकास खंड के रमगढ़वा गांव में रहने वाले रघुवंश का बेटा दीपक चलने- फिरने में तकलीफ महसूस करता है और अब तो उसकी आंखों की रोशनी भी कमजोर हो चली है। रघुवंश ने तो काम की तलाश में गांव ही छोड़ दिया है। इसी तरह कुठिला गांव के सुखचैन का भी चैन छिन गया है। उसकी एक बेटी मीना तो दुनिया ही छोड़ चुकी है और दूसरी हिमांशी कुपोषण की गिरफ्त में है।

सुखचैन के पास राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना का जॉब कार्ड है परंतु उसे काम नहीं मिला लिहाजा उसने गांव ही छोड़ दिया है।

मध्य प्रदेश में कुपोषण कोई नई समस्या नहीं है। यहां हर साल सैकड़ों बच्चे इसका शिकार बनते हैं। सरकार द्वारा कुपोषण नियंत्रण के लिए बाल संजीवनी अभियान, शक्तिमान अभियान चलाने के साथ ही 186 कुपोषण पुनर्वास केंद्र संचालित किए जा रहे हैं। इसके बावजूद कुपोषण के पीड़ितों की संख्या साल दर साल बढ़ती जा रही है। बीते साल 2008-09 में 450 से अधिक बच्चों की कुपोषण से मौत हुई थी।

भोजन का अधिकार अभियान ने समाज चेतना अधिकार मंच के साथ रीवा जिले के जवा विकास खंड के आठ गांवों में बच्चों की सेहत जानने अभियान चलाया जिसमें एक बात खुलकर सामने आई है कि लगभग 83 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं।

रामगढ़वा, करैली, मोहनईया, कल्याणपुर, श्रामनगर, कुठिला, हरिजनपुर, खपटिहा में 100 बच्चों का वजन लिया गया जिनमें से 83 बच्चे कुपोषण के शिकार पाए गए हैं।

समाज चेतना अधिकार मंच के राम नरेश बताते हैं कि कुपोषित बच्चों के लिए कुपोषण पुनर्वास केंद्र बनाए गए हैं मगर उनकी क्षमता कुपोषित बच्चों की संख्या के मुकाबले बहुत कम है। वे बताते हैं कि जवा विकासखंड के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में कुपोषण पुनर्वास केंद्र बनाया गया है मगर उसकी क्षमता सिर्फ 10 बच्चों की है जबकि यहां कुपोषित बच्चे कई अधिक गुना हैं।

भूमिहीन समिति कृषक अधिकार मंच के छोटे लाल कहते हैं कि पिछड़े इलाकों में रहने वालों के लिए तो कुपोषण अभिशाप बन गया है। बच्चे के जन्म लेने का मतलब ही है घर में बीमारी का आना।

भोजन अधिकार अभियान के प्रशांत दुबे बताते हैं कि कुपोषित बच्चों के आंकड़े सरकार हमेशा छुपाने की कोशिश करती है और यही कारण है कि बच्चों की जरूरत के इंतजाम ही नहीं हो पाते हैं। सरकार कुपोषण पर नियंत्रण के लिए बाल संजीवनी अभियान और कुपोषण पुनर्वास केंद्र चलाने की बात कहती है परंतु हकीकत क्या है यह मैदानी इलाकों में जाने पर पता चलता है।

भोजन अधिकार अभियान के जरिए मिली रिपोर्ट के आधार पर एशियाई मानव अधिकार आयोग ने देश और मध्य प्रदेश के प्रमुख लोगों को कुपोषण की इस स्थिति से अवगत कराया है।

महिला बाल विकास विभाग के संचालक गुलशन बामरा ने आईएएनएस को बताया कि प्रदेश में 60 प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं, इसे वे झुठलाते नहीं हैं। इन आंकड़ों के आधार पर कहीं 80 प्रतिशत तो कहीं 40 प्रतिशत बच्चे कुपोषित होंगे।

बामरा का कहना है कि सरकार ने कुपोषण से निपटने के लिए कई प्रयास किए हैं। आंगनबाड़ी केंद्रों में साझा चूल्हा योजना शुरू की गई है साथ ही बच्चों को अब पंजीरी के स्थान पर रुचिकर भोजन दिया जा रहा है। इतना ही नहीं गंभीर रूप से कुपोषण ग्रस्त बच्चों को कुपोषण पुनर्वास केंद्र में रखा जाता है और दिन में तीन बार भोजन की व्यवस्था की जा रही है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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