प्रेसीडेंसी कॉलेज के गौरव को लौटाना आसान नहीं
192 वर्ष पुराने प्रेसीडेंसी कॉलेज को विश्वविद्यालय का दर्जा मिलने वाला है लेकिन अभी भी कई बुद्धिजीवियों का मानना है कि इस कॉलेज के गौरव को वापस लाने के लिए कई काम करने होंगे।
प्रसिद्ध कवि शंख घोष का कहना है, "प्रेसीडेंसी कॉलेज को विश्वविद्यालय बना देने से तब तक कई बदलाव नहीं होगा जब तक यहां अच्छे प्रोफेसर और छात्र नहीं पहुंचेंगे। प्रोफेसरों की बहाली उनकी योग्यता के अनुसार होना चाहिए न कि उनके राजनीतिक प्रभाव को देखते हुए।"
प्रेसीडेंसी कॉलेज के छात्र रह चुके घोष ने कहा कि संस्थान के शैक्षणिक माहौल में सुधार की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि ऐसे कदम से ही कॉलेज की खोई प्रतिष्ठा लौट सकेगी।
उल्लेखनीय है कि मूल रूप से इस कॉलेज को पहले हिंदू कॉलेज कहा जाता था। बाद में वर्ष 1855 में इसे प्रेसीडेंसी कॉलेज का नाम दिया गया। इस कॉलेज ने देश को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्र में एक से बढ़कर एक नाम दिए, जिसमें स्वामी विवेकानंद, वैज्ञानिक सत्येन्द्र नाथ बोस, नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे प्रतिष्ठित नाम शामिल हैं।
बुद्धिजीवियों का मानना है कि इन दिनों प्रेसीडेंसी कॉलेज को राजनीति का रोग लग गया है। अर्थशास्त्री और इसी कॉलेज के छात्र रह चुके दीपांकर दासगुप्ता ने कहा कि राजनीतिक प्रभाव ने इस शिक्षण संस्थान की छवि धूमिल कर दी है।
दासगुप्ता ने कहा कि प्रेसीडेंसी कॉलेज के विभिन्न संकायों के शिक्षक योग्यता से नहीं अपितु राजनीतिक संबंध से यहां पहुंच रहे हैं।
आगामी कुछ महीने में प्रेसीडेंसी कॉलेज को विश्वविद्यालय का दर्जा मिल जाएगा लेकिन इसे किसी कॉलेज को मान्यता देने का अधिकार नहीं होगा। यद्यपि कहा जा रहा है कि कॉलेज को विश्वविद्यालय का दर्जा देना आसान नहीं होगा।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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