कोपेनहेगन में उम्मीद के साथ हिस्सा लेगा भारत
कोपनहेगन, 6 दिसम्बर (आईएएनएस)। भारत और चीन जैसे देशों ने कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने की खुद से घोषणा कर कोपेनहेगन में एक अंतर्राष्ट्रीय हस्ती के रूप में सामने आए हैं। दोनों देशों की यह घोषणा ग्लोबल वामिर्ंग के समाधान का हिस्सा बनने को तैयार है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह 7-18 दिसम्बर तक जलवायु परिवर्तन पर चलने वाले इस शिखर सम्मेलन में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा तथा विश्व के 80 से अधिक नेताओं के साथ हिस्सा लेंगे।
पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने कहा, "कोपेनहेगन में हम सकारात्मक और लचीला रुख अपनाएंगे। लेकिन हम व्यापक और भेदभाव मुक्त समझौता चाहते हैं। हम एक वास्तविक समाधान में विश्वास रखते हैं और चीन जैसे देशों के साथ मिलकर काम करना चाहते हैं।"
भारत विश्व के 15 शीर्ष देशों में चौथा देश है, जिसने 2020 तक कार्बन उत्सर्जन में 2005 के स्तर से 20-25 प्रतिशत कमी लाने की घोषणा की है। चीन, ब्राजील, इंडानेशिया द्वारा कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने की घोषणा करने के बाद नई दिल्ली पर दबाव बढ़ गया था। चीन ने उत्सर्जन में 40-45 प्रतिशत की क मी लाने की घोषणा की है।
रमेश ने कहा, "प्रधानमंत्री ने मुझे स्पष्ट निर्देश दिया है कि भारत ग्लोबल वार्मिग की समस्या का कारक नहीं बनेगा, बल्कि भारत इस समस्या के समाधान के लिए उठाए जाने वाले सकारात्मक और संरक्षित कदम में सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित कराना चहेगा।"
योजना आयोग के एक विश्लेषक ने आईएएनएस को बताया कि भारत को कार्बन उत्सर्जन में 20-25 प्रतिशत की कमी का लक्ष्य पाने के लिए सौर ऊर्जा के उपयोग की योजना को व्यापक स्तर पर लागू करना होगा।
मेजबान देश डेनमार्क की ओर से तैयार ताजा प्रस्ताव के मसौदे में बातचीत के बदले उस तारीख की पहचान करने की कोशिश की गई है, जब उभरती अर्थव्यवस्थाएं अपने ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन की चरम अवस्था में होंगी।
जयराम रमेश ने कोपेनहेगन जाने से पहले संसद में कहा था, "भारत कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने की किसी भी कानूनी बंदिश को स्वीकार नहीं करेगा।"
विकसित और विकासशील देशों के बीच मुख्य बहस का बिंदु यह है कि जलवायु संरक्षण के लिए विकाशील देशों को किफायती मूल्य पर ग्रीन तकनीकी उपलब्ध कराने के लिए कोष की व्यवस्था कैसे की जाए।
बहरहाल जारी नीति, कूटनीति, बहस के बीच चिंता का विषय यह है कि जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न हो रही बाढ़, सूखा, समुद्र के जलस्तर में वृद्धि, तूफान जैसी समस्याएं दुनिया के कृषि उत्पादन पर लगातार असर डाल रही हैं।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस












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