दिल्ली में रहना चाहती थीं तसलीमा

इन दिनों अमेरिका में रह रही इस लेखिका के वेबसाइट पर डाले गए संदेश में बताया गया है कि वह अगस्त में यह सोचकर भारत लौटी थी कि कोलकाता ना सही, लेकिन वह दिल्ली में तो रह ही सकती है। लेकिन भारत सरकार ने उनकी अपील नामंजूर कर दी।
संदेश में बताया गया है कि भारत सरकार ने इस शर्त पर उनकी आवासीय परमिट की अवधि बढ़ाई कि वह भारत में लंबे समय तक नहीं रहेगी। उन्हें दोबारा भारत छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया गया। अगस्त में सरकार ने उनकी आवासीय परमिट और छह महीने [अगले साल 16 फरवरी तक] के लिए बढ़ा दी।
दरअसल, तस्लीमा भारत में स्थाई तौर पर रहने की इजाजत चाहती है। लेकिन इस सबंध में सरकार ने अभी तक कोई फैसला नहीं किया है। चिकित्सक से लेखिका बनने वाली तस्लीमा कोलकाता को अपना घर मानती है, वह पहले भी इस शहर में रहने की इच्छा जता चुकी है।
गौरतलब है कि वह वह 1994 से निर्वासित है। अपनी पुस्तक 'लज्जा' पर कट्टरपंथियों के विरोध को लेकर उन्हें बांग्लादेश छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। इस पुस्तक में मुस्लिम महिलाओं की दुर्दशा बयां की गई है।
तस्लीमा वर्ष 2000 में भारत आई थी और लगभग दो साल पहले कट्टरपंथी समूहों के हिंसक विरोध प्रदर्शन द्वारा भारत छोड़ने के लिए मजबूर किए जाने से पहले तक कोलकाता में रह रही थी। तब से वह बीच-बीच में भारत आती रही है, गुप्त स्थानों पर कुछ समय के लिए रहती हैं और फिर चली जाती हैं। इससे पहले उन्होंने कहा था कि अगले साल जनवरी में उनके भारत लौटने की योजना है।
वेबसाइट में कहा गया है कि उन्होंने बांग्लादेश लौटने की कोशिश की, लेकिन नाकाम रही। बांग्लादेश की सरकार ने उन्हें अपने देश में लौटने की इजाजत नहीं देकर उनके मानवाधिकारों का हनन करने का कार्य जारी रखा है।












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