'कभी मैं अपने साथ जीता था'

नई दिल्ली, 28 नवंबर (आईएएनएस)। मैं जब अपनी जिंदगी पर निगाह डालता हूं तो पाता हूं कि एक जमाना था कि मैं अपने साथ जीता था। आखिर जिंदगी है क्या? जिंदगी रिश्तों का नाम हैं। रिश्ता जैसा जिससे जुड़ता है वैसे ही जिंदगी गुजरती है। परिवार से, अपने से, देश से, गरीब से, प्रकृति से।

नई दिल्ली, 28 नवंबर (आईएएनएस)। मैं जब अपनी जिंदगी पर निगाह डालता हूं तो पाता हूं कि एक जमाना था कि मैं अपने साथ जीता था। आखिर जिंदगी है क्या? जिंदगी रिश्तों का नाम हैं। रिश्ता जैसा जिससे जुड़ता है वैसे ही जिंदगी गुजरती है। परिवार से, अपने से, देश से, गरीब से, प्रकृति से।

कुछ लोग ऊपर वाले से भी रिश्ता जोड़ लेते हैं। हम तो उतना अभी जोड़ नहीं पाए हैं लेकिन प्रकृति तक जरूर पहुंचे हैं। हमको याद है एक समय हमारा रिश्ता था हमारे गांव से। वहां पढ़ाते थे, सड़क बनाने का काम भी करते थे, हाथ से फावड़ा भी चलाते थे और आनंद से पेड़ों के नीचे तख्त पर सो जाते थे। आज अखबार में क्या निकला, इसकी चिंता नहीं होती थी, न अखबार देखते थे।

हम अपने साथ जीते थे, अपने अंतस के साथ जीते थे, प्रकृति के साथ जीते थे। सोचते थे सबसे बड़ी दौलत यह मिल गई तो आगे हमें क्या जरूरत है। धीरे-धीरे बजाय अपने साथ रहने के अपने नाम के साथ मैंने दोस्ती जोड़ ली और मैं समझता हूं वही मेरी गड़बड़ी हुई। अपने को छोड़ कर अपने नाम को जोड़ लिए। जब नाम से जोड़ लिए तो पर-स्वीकृति पर चले गए।

दूसरे की स्वीकृति चाहिए अगर नाम करना है। अपने साथ जियो तो मस्ती है, किसी की स्वीकृति नहीं चाहिए। मैं जग से जरूर जुड़ा, नाम से जुड़ा और इसमें बहुत कुछ खोया भी। नाम से बहुत कुछ पाया लेकिन खोया भी बहुत कुछ।

एक कविता मैंने लिखी है कि हाल वही होता है जो राकेट का होता है। ऊंचाई पर पहुंचते-पहुंचते खोखला हो जाता है। ऊंचाई हासिल करने के लिए जो निजी कीमत देनी पड़ती है, शायद मैंने भी दी है लेकिन उसमें संतोष कभी-कभी हो जाता है। कभी गरीबों से जुड़कर कुछ हो जाता है तो लगता है शायद मैं वापस अपने से थोड़ा नजदीक आ गया हूं। पेंटिंग कर ली, कविता लिख दी तो लगता है कि अपने नजदीक फिर से आ गया।

एक शब्द इंडोनेशिया में मोहब्बत और प्यार के लिए बहुत अच्छा है। उनका शब्द चिंता है। हमको प्रेम की इससे बढ़िया परिभाषा नहीं मिली। अगर चिंता ही नहीं तो प्यार क्या? प्यार का पहला लक्षण है चिंता। अगर चिंता हो रही है तभी प्यार है। चिंता नहीं तो प्यार नहीं। हमारी चिंताएं क्या हैं, ये हमारे जीवन पर निर्भर करता है। हमारी चिंता का दायरा क्या है? संकुचित है या बड़ा?

जहां तक मेरी बीमारी की बात है, हमको याद है जब पहली बार न्यूयार्क में डॉक्टर ने कहा कि आपको मल्टीपल मायलोमा है। किडनी हमारी पहले ही प्रभावित हो चुकी थी। उसने घुमा-फिरा कर यही कहा कि कैंसर हो चुका है। पहला विचार किया कि मेरी पत्नी सीता का क्या होगा। उस समय वे मेरे बगल में हुई थीं। फिर उस समय मेरे मन में आया कि मैं घुटने नहीं टेकूंगा। मेरा शरीर टूट सकता है मैं नहीं टूटूंगा। मैं गिड़गिड़ा कर तो नहीं जाऊंगा। जाना है तो सम्मान के साथ जाऊंगा।

दिल भारी हुआ। मैं झुरमुटों में जाता था, समुद्र के किनारे जाकर बैठता था और अपने से पूछता था कि कितने दिन और? एक दूरी लगने लगी जीवन में। मैंने बीमारी से संघर्ष पूरा किया लेकिन मैंने उसे स्वीकार भी कर लिया। मैं सोचता था कि बीमारी जो ले गई सो ले गई लेकिन जो आखिरी दिन बचे हैं उन्हें मैं मुंह लटका के क्यों बिताऊं?

इस स्वीकृति ने मुझे यह ताकत दी कि जो दिन बचे हैं उनका तो उपयोग करो और जब आईने में देखता हूं तो सोचता हूं कि आज तो मैं जाने वाला हूं नहीं, आज तो मैं डटकर काम करूंगा। जब कल होगा तो देखा जाएगा और अगर किसी चीज का दुख और भय निकल जाए तो उसका दंश निकल जाता है।

बीमारी तो नहीं जाएगी। मैंने विनोबा की एक किताब में पढ़ा कि भगवान से यह प्रार्थना मत करो कि मेरे दुख दूर करो, भगवान से यह प्रार्थना करो कि मुझे दुख सहने की शाक्ति दो और मेरे भगवान तो यहीं बैठे हुए हैं।

ऐसी बीमारी में आदमी कमरे में लेटे-लेटे एकाकी हो जाता है और यह अहसास हो जाए कि कोई नहीं है फिक्र करने वाला, तो बहुत टूट जाता है। लेकिन उन क्षणों में जब यह अहसास रहता है कि कुछ लोग तो हैं तो वह टूटने से बहुत हद तक बच जाता है। यही अहसास उन घड़ियों में मेरा बड़ा भारी संबल रहा है, इसलिए मैं आप सबका बहुत आभार व्यक्त करता हूं। आप सबका बहुत-बहुत धन्यवाद।

मैं मानता हूं गंभीर बीमारियों के बाद भी कि अगर मैं इतने समय तक चलता रहा, जिन्दा रहा तो उसमें बहुत कुछ हिस्सा लोगों के स्नेह और आशीर्वाद का रहा है। मैं जानता हूं कि जब दवा काम नहीं करती तब कभी-कभी दुआ काम करती है।

(पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह से साक्षात्कार के आधार पर वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय द्वारा संयोजित एवं राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'मंजिल से ज्यादा सफर' से साभार)

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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