आतंकवाद को पराजित करें या इससे हार मान लें (विशेष टिप्पणी)

नई दिल्ली, 14 सितम्बर (आईएएनएस)। आतंकवादियों ने राजधानी दिल्ली में 13 सितंबर 2008 को एक बार फिर बड़ा हमला किया है। इससे पहले अक्टूबर 2005 में हुए सिलसिलेवार धमाकों में यहां 50 लोग मारे गए थे और 119 घायल हुए थे।

नई दिल्ली, 14 सितम्बर (आईएएनएस)। आतंकवादियों ने राजधानी दिल्ली में 13 सितंबर 2008 को एक बार फिर बड़ा हमला किया है। इससे पहले अक्टूबर 2005 में हुए सिलसिलेवार धमाकों में यहां 50 लोग मारे गए थे और 119 घायल हुए थे।

दिल्ली में शनिवार को हुए धमाकों की जिम्मेदारी इंडियन मुजाहिदीन नामक एक देसी आतंकवादी गुट ने ली है। यह संगठन गत मई में पहली बार तब चर्चा में आया जब उसने 13 मई 2008 को जयपुर में हुए श्रृंखलाबद्ध धमाकों की जिम्मेदारी ली। उन धमाकों में 63 निर्दोष लोग मारे गए थे। गुजरात सरकार का कहना है कि 26 जुलाई को अहमदाबाद में हुए धमाकों के सिलसिले में गिरफ्तार आतंकवादियों ने माना था कि उनका अगला निशाना दिल्ली था और इस बात की जानकारी केंद्र सरकार को दे दी गई थी। उन धमाकों में 56 लोगों की मौत हो गई थी।

अहमदाबाद धमाकों से पहले भेजे गए ईमेल में इंडियन मुजाहिदीन ने कहा था, "गुजरात में मुस्लिमों के साथ हो रहे अन्याय और दुर्व्यवहार के चलते हम जिहाद की घोषणा करते हैं और अपने भाइयों का साथ मांगते हैं ताकि हम एक होकर इन हिंदुस्तानी काफिरों को जवाब दे सकें। गुजरात के मुस्लिमों हम तुम्हारा आह्वान करते हैं कि उठो अपने दिलों में साहस और बहादुरी पैदा करो ताकि तुम्हारे भीतर से इन घृणित हिंदुओं का डर दूर हो।"

दरअसल दिल्ली एक अरसे से आतंकवादियों के निशाने पर रही है। जनवरी 1997 से अब तक यहां विभिन्न आतंकवादी घटनाओं में 110 से अधिक लोग मारे गए और 650 के लगभग घायल हुए।

यह बेहद दुखद है कि देशभर में लगातार मासूम लोगों को आतंकवादियों द्वारा निशाना बनाया जा रहा है। आतंकवादी अपने कृत्यों को जायज ठहराने के लिए अल्लाह के नाम का इस्तेमाल कर रहे हैं। संविधान द्वारा दिए गए स्वतंत्रता के अधिकारों का दुरुपयोग करके वे देश को नष्ट करने का प्रयास कर रहे हैं। देश में आतंकवाद से निपटने के लिए एक विशेष कानून तक नहीं है लेकिन ऐसी प्रत्येक घटना के बाद हमें सत्तासीन लोगों के एक से बयान सुनने को मिलते हैं कि आतंकवादियों से कड़ाई से निपटा जाएगा आदि आदि।

सरकार से यह पूछा जाना चाहिए कि आखिर लोग कब तक अपने ही देश में डर के साये में जीते रहेंगे। यह कोई आतंकवादी घटना या कम क्षमता वाले धमाकों का मामला नहीं है। यह युद्ध है हमारे देश के खिलाफ, इसके निर्दोष नागरिकों के खिलाफ। जितनी जल्दी सरकार को इसका एहसास होगा उतना अच्छा होगा। उसे यह समझना चाहिए कि मुहब्बत और जंग में सबकुछ जायज होता है। बिना उत्कट इच्छा के आप यह लड़ाई नहीं लड़ सकते। दुश्मन को मारने का कोई नियम कायदा नहीं होता। सरकारों को वोट की राजनीति से ऊपर उठकर आतंकवाद के खिलाफ कड़े कानून लागू करने चाहिए। दुर्भाग्यवश राजस्थान और गुजरात विधानसभाओं में पारित आतंकवाद निरोधी कानून दिल्ली के गलियारों में धूल फांक रहे हैं।

इसके अलावा सरकार को यह भी समझना चाहिए कि अगर वह सुरक्षा की गारंटी नहीं दे सकती तो उसे विकास और विदेशी पूंजी निवेश, औद्योगीकरण तथा आर्थिक विकास आदि की बातें भूल ही जानी चाहिए। इसके अलावा मार्केट वेलफेयर ऐसोसिएशन के सदस्यों को निजी सुरक्षा गार्ड और 'क्लोज सर्किट टेलीविजन' (सीसीटीवी) कैमरा जैसे उपकरण इस्तेमाल करने चाहिए। पुलिस के ऊपर निर्भर रहने से बेहतर होगा कि वे अपनी कमाई का एक छोटा हिस्सा अपनी सुरक्षा पर खर्च करें। वैसे भी पुलिस का अधिकतर इस्तेमाल तो नेताओं की सुरक्षा में होता है जिनके बारे में दिल्ली उच्च न्यायालय तक ने कह दिया है कि वे कोई 'राष्ट्रीय धरोहर' नहीं हैं। सरकार को भी बहादुरी भरी नीरस बयानबाजी बंद करनी चाहिए जबकि वह उसका बचाव निष्ठा से नहीं कर सकती। आतंकवाद को लेकर किसी तरह का विचार विमर्श नहीं हो सकता उससे निपटने के दो ही तरीके हैं या तो उसे पराजित कीजिए या फिर उससे पराजित हो जाइए। हमें इसे पराजित करना ही होगा।

(लेखक केंद्रीय जांच ब्यूरो के पूर्व निदेशक हैं)

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस

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