कांग्रेस के 'स्थिरता' पर भाजपा के 'विश्वासघात', 'मंहगाई' और 'आतंकवाद' भारी
बंगलौर, 25 मई (आईएएनएस)। कर्नाटक विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के 'स्थिरता' पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के 'विश्वासघात', 'मंहगाई' और 'आतंकवाद' भारी पड़े हैं।
परिसीमन में पारंपरिक वोट बैंक समझे जाने वाली अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या बढ़ जाने के बावजूद कांग्रेस को आशा के अनुरूप सफलता नहीं मिली है।
गौरतलब है कि 2004 के चुनावों में भाजपा 79 सीटों के साथ सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी लेकिन कांग्रेस (65 ) और जनता दल-सेक्युलर (58) सीट ने गठबंधन बनाकर सरकार बनाने में सफलता हासिल की थी। उस समय दोनों दलों ने कहा था कि वे सांप्रदायिक ताकतों को सत्ता से बाहर रखना चाहते हैं।
कांग्रेस और जेडी-एस का यह गठबंधन अधिक समय तक नहीं चला और एच. डी. कुमारस्वामी ने 40 से अधिक जेडी-एस विधायकों के साथ भाजपा से हाथ मिला लिया और भाजपा को पहली बार दक्षिण के किसी राज्य में सत्तारूढ़ होने का सुख मिला।
कुमारस्वामी ने इस वादे के साथ मुख्यमंत्री पद की शपथ ली कि वह 20 महीने बाद भाजपा के बी.एस. येदियुरप्पा के मुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ करेंगे, लेकिन कुमारस्वामी ने अपना वादा नहीं निभाया। इस कारण भाजपा ने समर्थन वापस ले लिया और राज्य में अंतत: राष्ट्रपति शासन लागू करना पड़ा। इससे भाजपा को भारी सहानुभूति प्राप्त हुई।
भाजपा ने अपनी स्टार प्रचारक सुषमा स्वराज के कन्नड़ भाषा के ज्ञान का भी खूब उपयोग किया और उन्होंने धुंआधार प्रचार किया।
कांग्रेस ने यह चुनाव स्थिरता के मुद्दे पर लड़ा और लेकिन उसे इसका कोई फायदा नहीं मिला। बढ़ती मंहगाई ने भी उसकी समस्याएं बढ़ाने में अच्छी खासी भूमिका निभाई।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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