जला है 'खेत' जहां दिल भी जल गया होगा!
नई दिल्ली, 25 मई (आईएएनएस)। विकास के तथाकथित प्रतिमानों को हासिल करने के लिए इंसान प्रकृति के साथ कितनी नाइंसाफी कर सकता है? सदियों से चली आ रही परंपरा की संवदेनशीलता को कैसे ताक पर रख सकता है? इस बात के प्रमाण आपको आधुनिकता और तरक्की के नाम पर पनप रहे भोगवादी जीवन शैली से ऊपजे अंतर्विरोधों के संदर्भ में मिल सकते हैं।
नई दिल्ली, 25 मई (आईएएनएस)। विकास के तथाकथित प्रतिमानों को हासिल करने के लिए इंसान प्रकृति के साथ कितनी नाइंसाफी कर सकता है? सदियों से चली आ रही परंपरा की संवदेनशीलता को कैसे ताक पर रख सकता है? इस बात के प्रमाण आपको आधुनिकता और तरक्की के नाम पर पनप रहे भोगवादी जीवन शैली से ऊपजे अंतर्विरोधों के संदर्भ में मिल सकते हैं।
भारत उन देशों में है जहां जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी अर्थात जन्मभूमि को स्वर्ग से भी गरिमामयी स्थान प्राप्त है। लेकिन आज यह महज कहने -सुनने की बात बनकर रह गई है। हद तो देखिए जिस जमीन को किसान अपनी मां का दर्जा देते आए हैं, धरती माता के नाम से पुकारते आए हैं, आज उसकी गोद की हरीतिमा को लहू-लुहान करने पर उतारू हैं।
खाद्यान्न की टोकरी के नाम से जाने जाने वाले देश के अग्रणी राज्य पंजाब के संदर्भ में स्थिति की भयावहता को समझा जा सकता है, जहां किसान महज कुछेक रुपयों की बचत के लिए कृषि योग्य जमीन को बंजर बनाने में लग गए हैं। समस्या सिर्फ जमीन के बंजर होने तक ही सीमित रहती तो बात अलग थी। स्वास्थ्य, पारितंत्र व प्राकृतिक संसाधनों के लिए भी गंभीर संकट खड़ा हो गया है।
बात कटाई संपन्न होने के बाद गेहूं व धान की फसलों की डांठ को जलाने से संबंधित आसन्न दुष्परिणामों को लेकर है। पंजाब में किसान फिलहाल 5500 वर्ग किलोमीटर से ज्यादा क्षेत्रों में गेहूं व 12685 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रों में धान की डांठ जला रहे हैं। उपग्रहों से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार गेहूं की डांठों को जलाने से वातावरण में कार्बन मोनोक्साइड 34.66 ग्राम प्रति किलो डांठ, नाइट्रोजन आक्साइड 2.63 ग्राम प्रति किलो गांठ, मिथेन 0.41 ग्राम प्रति किलोमीटर, एअरोसोल (10) 3.99 ग्राम प्रति किलो गांठ व एअरोसोल (2.5) 3.76 ग्राम प्रति किलो कर दर से उत्सर्जित होता है।
गौरतलब है कि उक्त घातक गस व अति सूक्ष्म एयरोसोल फेफड़ों व अन्य श्वसन संबंधी बीमारियों के लिए जिम्मेदार होते हैं। फसलों की डांठ को जलाने से उत्पन्न समस्या का संबंध सिर्फ पर्यावरण प्रदूषण व ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन से नहीं है, मृदा यानी मिट्टी में पाए जाने वाले कार्बनिक संसाधनों की भारी क्षति से भी है।
यहां पर यह सवाल उठता है कि क्या किसान अपने कृत्यों के संभावित दुष्परिणामों से अनभिज्ञ हैं? लेकिन जो किसान दुष्प्रभावों को लेकर भिज्ञ हैं, क्या वह इन कृत्यों से बच रहे हैं। इसका उत्तर आपकों नहीं में मिलेगा। दरअसल समस्या की जड़ में कृषि का अत्यधिक यंत्रीकरण है। पंजाब के उन क्षेत्रों में जहां किसानों के पास फसलों की कटाई से संबंधित यंत्र यानी मशीन नहीं हैं आज भी परंपरागत तरीके से गेहूं व धान की कटाई कर रहे हैं, जहां डांठों को जलाने की आवश्यकता ही नहीं होती। मालूम होना चाहिए कि परंपरागत तरीके से की जाने वाली कटाई में फसल को उसकी पूरी लंबाई में काट लिया जाता है।
इससे इतर पंजाब के उन क्षेत्रों में जहां किसानों के पास कटाई के लिए अत्याधुनिक मशीन यानी रोटावेटर उपलब्ध है, कटाई के उपरांत गेहूं व धान की डांठ बहुतायत में जलाए जा रहे हैं।
आखिर उत्तर आधुनिक विकास की मदहोशी में झूम रहे समाज की मन:श्चेतना को कैसे बदला जाए ? गंभीर प्रश्न है लेकिन इसके जबाव ढ़ूंढने ही होंगे। अगर नहीं ढ़ूंढे तो सभ्यता को एक ऐसे संकट से दरपेश होना पड़ेगा, जिसमें विकास के मौजूदा माडल ही नहीं, तरक्की के तमाम दावों की पोल खुलकर सामने आ जाएगी।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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