"मियाँ, इस कप्तान सरफराज से तो पीके फिल्म का सरफराज अच्छा था, अनुष्का को ले उड़ा था"

अरे इस कप्तान सरफराज तो वो आपकी जो फिल्म थी 'पीके'.. उसी का सरफराज अच्छा था... उसको अनुष्का तो मिल गई थी कम से कम।

नई दिल्ली। चैपियंस ट्रॉफी के भारत-पाक मैच पर ना सिर्फ इन दो मुल्कों की बल्कि क्रिकेट के शौकीन दुनियाभर के लोगों की निगाहें थी, लेकिन पकिस्तान बेहद आसानी से हार गया तो लाहौर से इंग्लैंड के बर्मिंघम मैच देखने आए चचा बख्तावर का दिल ही टूट गया।

मियाँ, इस सरफराज से तो 'पीके' का ही सरफराज अच्छा था

बख्तावर चचा को बड़ी उम्मीद थी कि पाक जीतेगा लेकिन हार के बाद वो खामोशी से मैदान के बाहर बैठे थे कि हम उनके पास पहुंच गए। हमारे ये बताने पर कि हम भारत से हैं, उन्होंने हमें जीत के मुबारकबाद दी और कहने लगे कि ये तो होना ही था हमारे लड़के तो एकदम ही घटिया खेले। हमने उनसे पंजाबी की जगह उर्दू में बातचीत करने की दरख्वास्त की तो वो मान गए और बताने लगे कि आखिर पाक मैच क्यों हारा?

रिपोर्टर- चचा बख्तावर, लाहौर से मैच देखने बड़ी उम्मीद लेकर इंग्लैंड आए। इस हार से आपको दुख तो हो रहा होगा?

चचा बख्तावर- हां दुख तो हुआ साहब, ऊपर से बार-बार बारिश और हवा. हमारी तो छतरी भी उल्ट गई, ये नुकसान अलग... वैसे मियाँ, आप हमें बेतकल्लुफी से सिर्फ चचा बुला सकते हैं?

रिपोर्टर- हां तो चचा बताएं।

चचा- देखिए, लड़कों की शुरुआती बॉलिंग देखकर ही हम समझ गए थे कि यही सब होने वाला है..

रिपोर्टर- जी, लड़के??

चचा- अरे लड़के मतलब हमारी पाक टीम के खिलाड़ी...

रिपोर्टर- अच्छा.. लेकिन आखिर आपकी टीम के इस हाल की वजह क्या रही?

चचा- साहब, देखिए लड़के खराब तो खेले ही लेकिन इंग्लैंड के मौसम और टीम में कई पंजाबियों के होने की वजह से भी हम हारे..

रिपोर्टर- जी वो कैसे?

चचा- ये पंजाब वाले सुबह उठे तो इन्होंने लंदन की सर्दी देख के समझा कि दिसंबर चल रहा है, बस इन्होंने तो सरसो के साग की फरमाइश कर दी, वो ना मिल सका तो बोले खिचड़ी बनवाओ और मक्खन से खाएंगे, जैसे अपने गांव में खाते थे। मैच के लिए मैदान पर जाने से पहले लड़कों ने खूब खिचड़ी उड़ाई.. आप देखें ही होंगे रियाज बोल कहां-कहां बॉल डाल रहा था. अब साहब पांचों उंगली घी में होंगी तो वो उंगलियां बॉल संभाल पाएंगी क्या??

रिपोर्टर- हां ये तो आप ठीक कहते हैं..

चचा- सही तो हम कह ही रहे हैं, देखे नहीं फिल्डिंग में जो लड़कों को उठना-बैठना ऐसे मुश्किल हो रहा था जैसे गठिया के मरीज हों.. ये सब खिचड़ी का ही तो असर था.

रिपोर्टर- अच्छा, वो बात तो ठीक है लेकिन बल्लेबाजी भी बेहद कमजोर रही. उस पर क्या कहेंगे?

चचा- कहना को बचा ही क्या है बेटा अब? पाक के लड़कों को बल्लेबाजी करते देख लग रहा था कि जैसे अमेरिका के दबाव में खेल रहे हैं, शॉट मारेंगे तो अमेरिकी इनको ना कर्ज नहीं देगा...

रिपोर्टर- किसी खिलाड़ी के प्रदर्शन से कुछ खास नाराजगी ?

चचा- ये अपना शोएब है ना.. मलिक। इसकी शादी जब से हिन्दुस्तान में हुई है, मुझे लगता है कि ये ससुराल मुल्क के लिए नरम दिल रखता है..

रिपोर्टर- नरम दिल मतलब सॉफ्ट कॉर्नर???

चचा- हां वहीं.. अमा मियाँ ये अंग्रेजी अल्फाज हमसे नहीं आते हैं।

रिपोर्टर- अच्छा आप, कप्तानी के बारे में क्या कहेंगे सरफराज की..

चचा- अरे इस कप्तान सरफराज तो वो आपकी जो फिल्म थी 'पीके'.. उसी का सरफराज अच्छा था... उसको अनुष्का तो मिल गई थी कम से कम, पाकिस्तान की कुछ तो इज्जत बची.. इस सरफराज ने तो मैच और अनुष्का दोनों कोहली को दे दिए..

रिपोर्टर- आगे आपको अपनी टीम से क्या उम्मीदें हैं चचा?

चचा- देखो में साफ कर दूं कि मैदान पर तो लड़कों से ना हो पाएगा और वापस मुल्क लौटने पर इनकी कंबल कुटाई पक्की है तो अब यही अच्छा कि मैदान के आस-पास कोई काम देख लें..

रिपोर्टर- जी, मैदान के आसपास काम?

चचा- हां और क्या?? मैदान के आसपास चिप्स का ठेला खूब चलेगा, बार-बार बारिश आती है तो छतरी ठीक करने का ठिया लगाया जा सकता है. एक-दो पंजाब के मशहूर पराठें की दुकान लगा लें. देखो साब गुस्से में दिमाग भन्नोट है, कुछ कह बैठेंगे.. वैसे अब हमें लाहौर के लिए निकलना है तो हम चलते हैं, खुदा हाफिज...

(यह एक व्यंग्य लेख है)

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