सरकारी पैसे से वीआईपी सुरक्षा क्यों?

इस सबके ऊपर राज्यों के मुयमंत्री और आला अधिकारियों की सुरक्षा में बड़ी संख्या में पुलिस वाले लगे रहते हैं जबकि कागजों पर उनकी ड्यूटी जनता की सुरक्षा के लिए लगाई जाती है। इस तरह की सुरक्षा की व्यवस्था ज्यादातर नेताओं के लिए ही की जाती है। तर्क यह होता है कि सरकारी काम करने के चक्कर में नेता लोग ताकतवर अपराधियों को नाराज कर देते हैं जो बदला लेने के उद्देश्य से उनको नुकसान पहुंचा सकते हैं। बहुत सारे पूर्व मंत्रियों और नेताओं को भी सुरक्षा मिली हुई है। उनको खतरा है कि सरकारी कामकाज करने के दौरान उन्होंने ऐसे काम किए होंगे जिसकी वजह से उन्हें खतरा है लिहाजा उनकी जान बचाए रखने के लिए जनता के पैसे से उन्हें सुरक्षा मुहैया कराई जाए।
सुरक्षा की जरूरत पर बहस
गृहमंत्री पी.चिदंबरम ने वीआईपी सुरक्षा व्यवस्था की उपयोगिता और उसकी जरूरत पर राष्ट्रीय बहस की शुरुआत करने की घोषणा की है। उनका तर्क है कि ऐसे लोग जिन्हें सुरक्षा की जरूरत नहीं है, उन की सजावट के लिए जनता का पैसा फूंकना कोई अक्ल़मंदी नहीं है। चिदंबरम ने इस बहस को गंभीरता देने के लिए अपनी सुरक्षा को कम से कम स्तर पर रखने का फैसला किया है। सुरक्षा के फालतू तामझाम से बचने वाले शीर्ष नेताओं में पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम का नाम सरे-फेहरिस्त है।
इस तरह से और भी बहुत से नेता हैं जिन्हें सुरक्षा के तामझाम की जरूरत नहीं है। अमरीका और यूरोप के कई देशों में सरकारी खर्च पर सुरक्षा केवल संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को ही सुरक्षा दी जाती है। चिदंबरम का तर्क है कि अपने यहां भी सरकारी काम करने वाले लोगों को ही सुरक्षा दी जानी चाहिए और अगर किसी को ऐसा खतरा है तो उसे अपने खर्च पर सुरक्षा का इंतजाम करना चाहिए।
इस बहस की शुरुआत के पीछे गृहमंत्री की उस झल्लाहट का भी योगदान है जो वे आजकल झेल रहे है। झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा और पीलीभीत के नवनिर्वाचित सांसद, वरुण गांधी ने जेड प्लस सुरक्षा व्यवस्था की मांग की है और यह महानुभाव गृहमंत्रालय के चक्कर काट रहे हैं। इसी तरह से कुछ और भी लोग हैं जो दिन रात सुरक्षा व्यवस्था की फरियाद करते रहते हैं। सवाल है कि जब एपीजे अब्दुल कलाम या पी.चिदंबरम सुरक्षा के तामझाम के बिना सुरक्षित महसूस करते हैं तो बाकी छुटभैय्ये नेताओं को सुरक्षा की इतनी सख्त आवश्यकता क्यों पड़ती है।
नेहरू को नहीं चाहिए थी सुरक्षा
जहां तक मंत्री पद पर रह चुके लोगों की बात है, वह तो समझ में आती है लेकिन जो कभी किसी सरकारी पद पर रहा ही नहीं हो उसने जनहित में ऐसा क्या काम कर दिया कि उसके पीछे देश के दुश्मन और निहित स्वार्थ के लोग पड़ गए और उसकी जान को खतरा पैदा हो गया। वह भी उस देश में जहां सत्ता की राजनीति के शीर्ष पुरुष जवाहर लाल नेहरू रहे हों। जवाहरलाल नेहरू के साथ सुरक्षा का कोई तामझाम नहीं रहता था, दिल्ली के रीगल सिनेमा में इंदिरा जी के और अन्य लोगों के साथ वे सिनेमा भी देखते थे, जहां आज अशोक होटल है, वहां रोज ही टहलते थे और त्यौहारों के मौके पर उनके घर पर कोई सुरक्षाकर्मी नहीं होता था। उनकी सवारी निकलने पर कभ भी कोई सड़क बंद नहीं की जाती थी। यह इंतजाम तो 1979 तक रहा। प्रधानमंत्री की सवारी निकलने पर सड़कें बंद नहीं होती थीं।
1980 में सब कुछ बदल गया। इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी ने बड़ी संख्या में अपराधियों को टिकट दिया। इंदिरा लहर में सब जीत गए और माननीय बन गए। जिन लोगों के घरों पर पुलिस दबिश देती रहती थी, उनके यहां पुलिस वाले सुरक्षा ड्यूटी में लगाए जाने लगे। जो लोग पुलिस की हवालात में बंद रहते थे, वे थानों का मुआयना करने लगे। इनके पिछले कारनामे से ऐसे थे कि उन्हें कोई भी राह चलते मार सकता था। अब चूंकि यह लोग संसद या विधानसभा के सदस्य थे, इसलिए इनकी हिफाजत का जिम्मा पुलिस को लेना पड़ा। हर ऐरे गैरे नेता को सुरक्षा देने की परंपरा यहीं से शुरू होती है। इसके बाद तो हर पार्टी में अपराधियों का बोलबाला हो गया। सरकार चाहे जिसकी बनती थी, नेताओं की सुरक्षा बद से बदतर होती गई और जिन पुलिस वालों को अपराध पर काबू करने की नौकरी दी गई थी, वे नेताओं की सुरक्षा में लग गए।
सरकारी सुरक्षा का दुरुपयोग
अगला दौर सरकारी सुरक्षा के दुरुपयोग का था। सांसद और विधायक के अलावा नेताओं के खास लोगों को भी सुरक्षा मिलने लगी। जिसके ऊपर भी मुख्यमंत्री मेहरबान हो गए, उसे गनर उपलब्ध करा दिया। ऐसे सैकड़ों मामले प्रकाश में आए हैं जहां अपना दबदबा बनाने के लिए नेताओं ने सरकारी सुरक्षाकर्मियों का इस्तेमाल किया। कई मामलों में तो किसी देनदार का पैसा हड़पने या जमीन पर नाजायाज कब्जा करने के लिए भी सुरक्षा में तैनात पुलिस वालों इस्तेमाल किया गया। अपना मुकामी रंग चमकाने और भौकाल बनाने में सुरक्षा कर्मियों के इस्तेमाल की भी बहुत सारी खबरें मिलती रहती हैं ज़ाहिर है इस सब का राष्ट्रीय हित और जनहित के किसी काम से कोई मतलब नहीं है।
सरकारी सुरक्षा की मशीनरी ज्यादातर राजनेताओं की ही खिदमत में लगी हुई है। इसलिए उसको खत्म कर पाना बहुत मुश्किल होगा। पिछले तीस साल में जिस नेतापोषक व्यवस्था ने अपनी जड़ें दूर-दूर तक फैलाईं हैं, उसको कमजोर कर पाना कठिन होगा लेकिन असंभव नहीं। गृहमंत्री ने भी इसे तुरंत खत्म करने की बात नहीं की। फिलहाल एक बहस की शुरुआत की है। ज़रूरत इस बात की है कि इस बहस का दायरा बढ़ाया जाए और अपराधी टाइप नेताओं को औकातबोध कराया जाए। वैसे लोकसभा चुनाव 2009 में जनता ने इसकी शुरुआत कर दी है। हालांकि कुछ अपराधी इस बार भी जीत गए हैं लेकिन बड़ी संख्या में अपराधियों को जनता ने लोकसभा पहुंचने से पहले ही रोक दिया है। बहस की शुरुआत हो चुकी है ज्यादा से ज्यादा लोगों को अपनी राय व्यक्त करना चाहिए। इससे हमारे लोकतंत्र को मजबूती मिलेगी।
[शेष नारायण सिंह वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार हैं।]
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