टूटते-बिखरते सपनों की कहानी

Children in Mauritius
जनसंवाद पर शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर लिख रहे राजेश उत्साही का एक लेख 'बचपन, शिक्षा और खलनायक' हजारों किलोमीटर दूर मॉरिशस में बैठी मधु के दिल को छू गया। उन्होंने इसी मुद्दे पर अपनी वेदना को शब्द दिए हैं। इससे हमें मानवीय मुद्दों, अच्छाइयों और बेहतर जिंदगी के सपने की वैश्विक अपील का भी पता लगता है। तो जिंदगी में जब भी आप कुछ बेहतर सोचें और उसे समझने वाला आसपास कोई न हो, तो निराश न हों, भरोसा रखें इस दुनिया में बहुत से लोग हैं जिनके लिए आपकी बात उनके दिल की बात है। संपादक

राजेश उत्साही जी के लेख ने [मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें] तो बरसों से छिपा मेरा एक सा जख्म सा कुरेद दिया, जिसे उम्र के इस दौर में आकर भी मैं कभी भर नही पाई। हमारी संस्कृति हमे गुरु या अध्यापक का सम्मान करना सिखाती है। गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काको लागू पायं जैसी भावनाओ के साथ गुरु को तो ईश्वर के समकक्ष बिठा देती है परंतु गुरु को कभी नही सिखा पाती की शिष्य को गढ़ने की जिम्मेदारी गुरु का कर्तव्य है।

यदि आज कुछ लोग आप को ऐसे मिलें जो कि यह कहते हों कि आज जीवन का जिस मुकाम पर वो पहुंचे हैं उस मे उन के गुरु का बहुत बड़ा हाथ है, तो विश्वास कीजिए उस से कही अधिक संख्या मे ऐसे लोग भी मिलेगे जो वेदना से भर कर कहेंगे कि यदि आज हम जीवन मे आगे नही बाद पाए, जो बनना चाहते थे नही बन पाए वो सिर्फ़ अपने एक अध्यापक के कारण।

मैं स्वयं इस वेदना से आज तक पीड़ित हूं। बचपन से मैने एक सपना देखा था की मैं एक डाक्टर बनूंगी ओर युद्ध क्षेत्र मे जा कर अपने जवानो की सेवा करूंगी। भोले बचपन का वो पवित्र सपना कभी पूरा नहीं हो पाया। इसका कारण थीं मेरी गणित की अध्यापिका अरुणा गुप्ता (पता नही वो आज जीवित हैं या नही)। मगर उन के क्रोधी स्वभाव ओर व्यंगात्मक शब्दों ने मुझे गणित से इतना डरा दिया, इतना दूर कर दिया कि भय के कारण मैं साइंस नही ले पाई।

छोटी सी भूल पर बाल खींचना, कक्षा से बाहर खड़ा करना.. उनके व्यवहार का आम हिस्सा थीं। बचपन की उन बातों के लिए मैं खुद को आज भी अपमानित महसूस करती हूं। मैं एक मेधावी छात्रा थी लेकिन कभी न तो स्कूल में ओर न कभी घर में किसी ने ये जानने की कोशिश की कि यह लड़की जो बाकी विषयों में अव्वल आती है सिर्फ गणित में क्यों पीछे रह जाती है।

हमारे जमाने मे अध्यापक पर माता पिता का इतना अंधविश्वास था कि घर आ कर अध्यापक की शिकायत करना मानो अपने लिए मुसीबत मोल लेना होता था। "अध्यापक कभी बिना बात नही डाँटते, या तुम ही ठीक से नही पढ़ती होगी या तुम्हारा ही कसूर होगा। टीचर कोई पागल थोड़ी है जो बिना बात सज़ा देगा..."

ये कुछ ऐसे जुमले थे जो लगभग हर घर मे दोहराए जाते थे। आज जीवन के इस मोड़ पर आकर जब पलट कर देखती हूं, तो पाती हूं कि मैने हार नही मानी। आगे बढ़ी। एक वकील बनी। दुनिया घूमी। अनेक लोगों से मिली। बहुत कुछ लिखा। बहुत कुछ पढ़ा.... लेकिन एक डाक्टर न बन पाने की पीड़ा आज भी मेरे अंदर है।

मैं सभी अध्यापकों और माता-पिता से कहना चाहूँगी वे हमेशा इस बात का ध्यान रखें कि कहीं आप की क्रूरता से, लापरवाही से या बच्चे के अंतर्मन को ठीक से न समझने के कारण कोई मासूम अपना सपना आप के हाथों से टूटते देख कर पूरा जीवन सिसक-सिसक कर गुजारने पर मजबूर न हो जाए। कहीं ऐसा ना हो कि हम किसी बच्चे के अंदर पनपते डाक्टर, इंजीनियर, वकील, आर्किटेक्ट या फिर संगीतकार का निर्माण होने से पहले गला घोंट दे।

राजेश जी बधाई के पात्र हैं। और उस लेख को पढ़ने वाले सभी लोगों को उनकी बातों का वजन समझते हुए खुद पर जि्म्मेदारी लेनी चाहिए। बच्चा सिर्फ़ माता पिता का नही बल्कि पूरे समाज का होता है ऐसा मान कर चलना होगा। वेदों मे जिस माँ को माता निर्माता भावती कह कर सम्मानित किया गया है, उस गुम माँ को खोज निकलना है।

[मधु गजाधर मारिशस में रेडियो तथा टीवी प्रस्तुतकर्ता हैं। वह मारिशस में हिन्दी भाषी समुदाय की संस्कृति, रहन-सहन तथा उनके सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर लिखती हैं।]

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