सिर्फ एक कवच का पाठ बदल देगा आपका पूरा जीवन
नई दिल्ली। इस सृष्टि के एक-एक कण में देवताओं का वास है और देवताओं के अधीन नवग्रह हैं। सूर्य, चंद्र आदि नवग्रहों का प्रभाव प्रत्येक चर-अचर, सजीव-निर्जीव चीजों पर पड़ता है। इसलिए मनुष्य जब जन्म लेता है उस पल आकाशमंडल में ग्रहों की जो स्थिति रहती है उसी के अनुसार उसकी जन्मकुंडली का निर्धारण होता है। इसलिए जीवन की समस्त समस्याओं का निवारण करने के लिए नवग्रहों को प्रसन्न किया जाता है। वैदिक और तंत्र शास्त्रों में समान रूप से नवग्रहों को प्रसन्न करने के लिए अनेक उपाय बताए गए हैं। उनमें दान से लेकर मंत्र जप, स्तोत्र, कवच आदि का वर्णन मिलता है। आइए आज जानते हैं एक ऐसे ही दुर्लभ कवच के बारे में जिसका नियमित पाठ करने से नवग्रह प्रसन्न होते हैं और जीवन की बड़ी से बड़ी समस्या और बाधा समाप्त हो जाती है।

सृष्टि के एक-एक कण में देवताओं का वास है
तंत्र शास्त्र के प्रमुख ग्रंथ यामल तंत्र में नवग्रह को प्रसन्न करने के लिए एक अत्यंत दुर्लभ और शीघ्र प्रभाव दिखाने वाले नवग्रह कवच का वर्णन मिलता है। इसमें कहा गया है कि यह कवच नवग्रहों को अपने अधीन करने का अचूक उपाय है। लेकिन ध्यान रखने वाली बात यह है कि इस कवच का पाठ पूर्ण श्रद्धा और शुद्धता के साथ किया जाना चाहिए। पाठ करने वाले व्यक्ति को बुरी संगत, बुरे विचारों से दूर रहना चाहिए। कहा जाता है लंकापति रावण और उसके पुत्र मेघनाद ने इसी नवग्रह कवच के जरिए तमाम तरह की सिद्धियां प्राप्त की थीं, लेकिन वे उनका दुरुपयोग करने लगे थे इसलिए कवच का प्रभाव समाप्त हो गया था।

नवग्रह कवच का प्रयोग दो तरह से होता बै
इस नवग्रह कवच का प्रयोग दो तरह से किया जा सकता है। एक तो इसका नियमित पाठ किया जाता है। दूसरा इसे भोजपत्र पर केसर की स्याही से लिखकर चांदी के ताबीज में भरकर दाहिनी भुजा पर बांधा जाता है।

नवग्रह कवच मंत्र
ॐ शिरो में पातु मार्तण्ड: , कपालं रोहिणी पति:।
मुखमंगारकः पातु कण्ठं च शशिनंदनः।।
बुद्धिं जीवः सदा पातु हृदयं भृगुनंदनः।
जठरं च शनिः पातु जिव्हां मे दितिनंदनः।।
पादौ केतुः सदा पातु वाराः सर्वांगमेव च।
तिथयौष्टौ दिशः पान्तु नक्षत्राणि वपुः सदा।।
अंसौ राशिः सदा पातु योग्श्च स्थैर्यमेव च।
सुचिरायुः सुखी पुत्री युद्धे च विजयी भवेत्।।
रोगात्प्रमुच्यते रोगी बन्धो मुच्येत बन्धनात्।
श्रियं च लभते नित्यं रिष्टिस्तस्य न जायते।।
पठनात् कवचस्यास्य सर्वपापात् प्रमुच्यते।
मृतवत्सा च या नारी काकवन्ध्या च या भवेत्।।
जीववत्सा पुत्रवती भवत्येव न संशयः।
एतां रक्षां पठेद्यस्तु अंगं स्पृष्टवापि वा पठेत्।।
नोट: यह कवच यामल तंत्र के अनुसार है जिसमें सात पद हैं। अन्य ग्रंथों में इसके अनेक भेद हैं। किसी में नौ पद तो किसी में 11 पद भी हैं, लेकिन सर्वमान्य यामल तंत्र ही है।
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