Kundali: क्या होता है जब जन्मकुंडली में मंगल वक्री बैठा हो?

नई दिल्ली। मंगल, शनि, राहु और केतु ये ऐसे ग्रह हैं जिनके बारे में लोगों के मन में भ्रम और भय रहता है। और जब ये ग्रह वक्री हो जाएं तो लोग और भी अधिक भयभीत हो जाते हैं। यह बात कुछ हद तक सही भी है, क्योंकि वक्री ग्रह अपना बुरा प्रभाव तो दिखाते ही है, लेकिन ऐसा हमेशा नहीं होता। कभी-कभी वक्री ग्रह व्यक्ति को रंक से राजा भी बना देते हैं।

आइए जानते हैं जन्मकुंडली में वक्री मंगल होने का क्या प्रभाव होता है..

 शारीरिक शक्ति एवं आंतरिक ताकत

शारीरिक शक्ति एवं आंतरिक ताकत

जब मंगल वक्री होता है तो शारीरिक शक्ति एवं आंतरिक ताकत दोनों लगभग समाप्त हो जाती है। जिस जातक की कुंडली में मंगल वक्री होता है वह छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा हो जाता है, चिड़चिड़ हो जाता है, प्रत्येक व्यक्ति को शक की निगाह से देखने लगता है, उसका अपनी वाणी पर संयम नहीं रह जाता और भड़काउ बातें करने लगता है। वक्री मंगल वाला व्यक्ति निष्क्रिय हो जाता है। जब तक उस पर किसी का दबाव ना हो वह कोई भी कार्य नहीं करता। वक्री मंगल से प्रभावित व्यक्ति वैज्ञानिक, डॉक्टर या रहस्यमयी विद्याओं के ज्ञाता होते हैं। या फिर ऐसे कार्यों में लगे रहते हैं जिनमें ज्यादा शारीरिक श्रम ना करना पड़े।

अलग-अलग भावों में वक्री मंगल का प्रभाव

अलग-अलग भावों में वक्री मंगल का प्रभाव

  • वक्री मंगल यदि प्रथम भाव में हो तो व्यक्ति झूठ बोलने में माहिर होता है। ऐसे व्यक्ति में अहंकार अत्यधिक होता है और स्वयं को सबकुछ समझने की भूल कर बैठता है।
  • वक्री मंगल यदि द्वितीय भाव में हो तो व्यक्ति को कृतघ्न बना देता है। ऐसा व्यक्ति आकर्षक वस्तुओं और सुंदर स्त्रियों के प्रति गलत विचार रखते हैं। भौतिस सुख-साधनों के पीछे दौड़ते रहते हैं।
  • वक्री मंगल तृतीय भाव में होने पर जातकों का अपने भाई-बहनों और परिजनों से मनमुटाव बना रहता है। ऐसा व्यक्ति अनुशासनहीन हो जाता है और किसी के अंडर में काम करना पसंद नहीं करते हैं।
  • चतुर्थ भाव में वक्री मंगल बैठा हो तो जातक क्रोधी, हठी और क्रूर हो जाता है। इनके परिवार में हमेशा लड़ाई-झगड़े होते रहते हैं। ऐसा व्यक्ति किसी की भी नहीं सुनता, निरंकुश हो जाता है और जो मन में आता है वही करता है।
  • पंचम भाव का वक्री मंगल अत्यधिक खराब होता है....

    पंचम भाव का वक्री मंगल अत्यधिक खराब होता है....

    • पंचम भाव का वक्री मंगल अत्यधिक खराब होता है। ऐसा जातक प्रेम संबंध के मामले में अपने पार्टनर को केवल उपभोग की वस्तु समझता है। ऐसा व्यक्ति दुष्कर्मी और बच्चों के साथ गलत हरकतें करता है। स्वयं की पत्नी और प्रेमिका के साथ जोर-जबरदस्ती करता है।
    • छठे भाव में वक्री मंगल होने पर जातक रोगों से घिरा रहता है। समय पर दवाई नहीं लेने के कारण अपनी बीमारी स्वयं बढ़ा लेता है। ऐसा व्यक्ति अपने करीबी लोगों के साथ ही अमानवीय व्यवहार करता है।
    • सप्तम भाव में वक्री मंगल होने पर व्यक्ति का मन गुप्त संबंधों में लगा रहता है। ऐसा व्यक्ति व्यापार में धोखा खा जाते हैं। कोर्ट-कचहरी के मामले इनके जीवन में चलते रहते हैं।
    • अष्टम भाव का वक्री मंगल जातक को दुखों से घेरे रखता है। ऐसा जातक तुनकमिजाज होता है और छोटी-छोटी बातें सहन नहीं होने के कारण नौकरी से त्यागपत्र दे देता है।
    • नवम भाव में वक्री मंगल होने पर जातक नास्तिक होते हुए भी आस्तिक होने का ढोंग करता है और धर्म के नाम पर लोगों को धोखा देता है। ऐसं व्यक्ति की कुंडली में अन्य बुरे ग्रह प्रभावी हो तो संभव है कि व्यक्ति जेल भी चला जाए।
    • दशम भाव का वक्री मंगल जातक को भटकाता बहुत है। चाहे वह नौकरी के लिए भटकाए या पारिवारिक जरूरतों को पूरी करने के लिए भटकाए। ऐसे व्यक्ति पर कोई विश्वास भी नहीं करता है।
    • एकादश भाव में वक्री मंगल हो तो जातक की दोस्ती अपने से निम्न स्तरीय लोगों के साथ रहती है और उनके मित्र भरोसेमंद नहीं होत हैं। वक्त आने पर वे साथ छोड़कर भाग जाते हैं।
    • द्वादश भाव का वक्री मंगल स्वयं अपने स्वास्थ्य का दुश्मन होता है। उसका खानपान और लाइफ स्टाइल पूरी तरह गड़बड़ होती है, जिससे वह अनेक रोगों का शिकार हो जाता है।

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