भोग विलासी, धनवान, चिड़चिड़ा और आलसी भी बनाता है केतु

यदि केतु शुभ भावों में शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो शुभ परिणाम आता हैं।

नई दिल्ली। नवग्रहों में राहु और केतु को छाया ग्रह माना गया है, यानी ये जिस ग्रह के साथ होते हैं उसी की छाया बन जाते हैं। उसी के समान व्यवहार करने लगते हैं, लेकिन इनका अपना अलग-अलग प्रभाव भी होता है, जो जातक को अच्छे और बुरे दोनों तरह के प्रभाव दिखाते हैं।

आइये आज हम बात करते हैं केतु ग्रह की, केतु केवल बुरे नहीं, अच्छे प्रभाव भी दिखाता है। यदि केतु शुभ भावों में शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो शुभ परिणाम आता हैं। उदाहरण के तौर पर केतु यदि कुंडली के तृतीय भाव में हो तो वह जातक को महा धनवान, ऐश्वर्य संपन्न और भोग विलासी बनाता है, लेकिन यदि पंचम भाव में हो तो व्यक्ति को चालबाज, षड्यंत्रकारी, आपराधिक प्रवृत्ति वाला और धूर्त बनाता है।

प्रभम भाव या लग्न भाव: लग्न भाव में केतु होने पर जातक दुर्बल, कृशकाय, कमर में पीड़ा रहती है। वातरोग से पीडि़त, उदास, परेशान, स्त्री चिंता से पीडि़त, झूठा, दंभी, चंचल, डरपोक, दुराचारी, महामूर्ख, अनेक शत्रुओं से पीडि़त होता है। लग्न में केतु होने पर जातक के जीवन का पांवचां वर्ष महाकष्टकारी होता है। यहां तक कि उसे मृत्यु के समान कष्ट भोगना पड़ता है। ऐसे जातक के कार्य निरंतर असफल होते हैं। वृश्चिक का केतु लाभदायक होता है।

 कुंटुब विरोधी, मुख रोग से पीडि़त

कुंटुब विरोधी, मुख रोग से पीडि़त

  • द्वितीय भाव: द्वितीय भाव में केतु हो तो जातक दुष्टात्मा, अशोभनीय कार्य करने वाला, कुंटुब विरोधी, मुख रोग से पीडि़त, नीच-दुष्ट, दुर्बुद्धि लोगों का साथ देने वाला होता है। ऐसा जातक अपने परिवार, धर्म, समाज का विरोधी होता है इसलिए इसे अक्सर अपमानजनक स्थितियों का सामना करना पड़ता है। फालतू के कार्यों में धन गंवाता है और पूर्वजों द्वारा संचित संपत्ति का नाश करता है। केतु स्वग्रही सिंह, कन्या, वृश्चिक, धनु राशिगत हो तो श्ुभ होता है तथा सुखों का भोग करता है।
  • तृतीय भाव: तीसरे भाव में केतु हो तो जातक महातेजस्वी, बलशाली, समस्त धन-ऐश्वर्य को भोगने वाला होता है। ऐसा जातक चंचल, वातरोगी, अटक-अटककर बोलने वाला, व्यर्थ के प्रपंचों में उलझने वाला, सभी लोगों का प्रिय लेकिन मानसिक रूप से चिंताग्रस्त होता हैं। भाइयों से सुख नहीं मिलता लेकिन बहनों का पूरा साथ मिलता है। यदि केतु के साथ अन्य पाप ग्रह हों तो भाइयों की मृत्यु हो जाती है।

उसका कोई मित्र भी नहीं होता...

उसका कोई मित्र भी नहीं होता...

  • चतुर्थ भाव: जिस जातक की कुंडली के चतुर्थ भाव में केतु हो उसे मां का सुख नहीं मिलता। उसका कोई मित्र भी नहीं होता और यदि मित्र हों तो वह उनसे धोखा पाता है। ऐसा जातक पिता के लिए भी हमेशा कष्टकारक होता है। काम के प्रति इसमें कोई उत्साह नहीं रहता। इसलिए बार-बार नौकरी छोड़ देता है या बिजनेस बदल देता है। सिंह और वृश्चिक राशि में चतुर्थ भाव में केतु हो तो माता-पिता का सुख मिलता है, लेकिन वह भी बहुत कम समय के लिए।
  • पंचम भाव: कुंडली के पंचम भाव में केतु हो तो व्यक्ति आपराधिक प्रवृत्ति का, चालबाज, धोखेबाज, षड्यंत्रकारी होता है। बलवाल, शक्तिशाली होता है, लेकिन अपने अधिकारों, शक्तियों का दुरुपयोग करता है। ऐसा व्यक्ति वीर होते हुए भी कई बार दासवृत्ति अपनाता है। इसकी संतानें बहुत कम होती हैं और प्रथम संतान कन्या होती है। शिक्षा के क्षेत्र में ऐसे व्यक्ति प्रायः असफल होते हैं।
  • झगड़ालू, क्रोधी, आवेशी, भूत-पिशाच

    झगड़ालू, क्रोधी, आवेशी, भूत-पिशाच

    • षष्ठम भाव: कुंडली का छठा भाव शत्रु स्थान होता है। जातक झगड़ालू, क्रोधी, आवेशी, भूत-पिशाच से पीडि़त होता है। कंजूस और मितव्वयी होता है। निरोगी, स्वस्थ, होता है। इसके पास बहुत से पशु होते हैं और उन्हीं से धन प्राप्त करता है। अपने वर्ग का मुखिया या नेता होता है। मातृ या मामा पक्ष से अपमानित होता है। केतु के साथ चंद्रमा हो तो राजपत्नी या संपन्न व कुलीन वर्ग की स्त्रियों से संसर्ग करता है। 21 व 36वें वर्ष में शत्रु भय होता है।
    • सप्तम भाव: इस भाव में केतु हो तो व्यक्ति मंदमति, मूर्ख, डरपोक, धन नष्ट करने वाला होता है। इसकी पत्नी हमेशा कष्टमय जीवन जीती है। नीच, विधवा और क्रोधी स्त्री से संबंध बनाता है। इसे जलघात रहती है। गहरे जल में डूबने से इसकी मृत्यु हो जाती है। गुप्त रूप से पापकर्म करता रहता है। देखा जाए तो ऐसा व्यक्ति जीवनभर भटकता रहता है। ऐसा जातक दो विवाह भी करता है।
    • अष्टम भाव: अष्टम भाव में केतु होने पर व्यक्ति दुष्ट और बुरे कर्मों में लोगों से मित्रता रखता है। स्त्रीभोगी, चालाक, गुदा रोग से पीडि़त होता है। नेत्र रोग से पीडि़त होता है तथा बार-बार वाहन दुर्घटनाएं होती हैं। लोगों की नजर में ऐसा जातक घृणा का पात्र होता है। इसकी स्त्री व संतान भी हमेशा रोगग्रस्त रहती है।
    • व्यर्थ के कार्यों में भागदौड़...

      व्यर्थ के कार्यों में भागदौड़...

      नवम भाव: नवमस्थ केतु वाला जातक सुखाभिलाषी होता है, इसलिए वह कई बार व्यर्थ के कार्यों में धन, समय व परिश्रम नष्ट करता है। इस कारण कई बार अपयश हाथ आता है। इसके बचपन में पिता को कोई गंभीर रोग होता है। दान-पुण्य, धर्म-कर्म, धार्मिक कार्यों में भाग नहीं लेता। पुत्र की चिंता निरंतर बनी रहती है।

      दशम भाव: केतु दशम भाव में हो तो जातक पिता से द्वेष रखने वाला होता है। व्यर्थ के कार्यों में भागदौड़ करता रहता है और हाथ कुछ आता नहीं। परस्त्रीगमी, दुराचारी, व्याभिचारी होता है। ऐसा व्यक्ति माता को भी कष्ट देता है। कफ प्रकृति युक्त होता है। केतु यदि शुभ ग्रहों से युक्त हो तो व्यक्ति बड़ा कवि, लेखक बनता है।

      एकादश भाव

      एकादश भाव

      ग्यारहवें भाव का केतु जातक को सुंदर बनाता है, लेकिन अपनी हानि स्वयं अपने कार्यों से कर बैठता है। मधुरभाषी, विद्वान दर्शनीय, भोगी, महातेजस्वी, उत्तम वस्त्राभूषण वाला, सुख युक्त होता है। इसका कुटुंब बहुत बड़ा होता है। ऐसे व्यक्ति के जीवन का 45वां वर्ष भाग्योदयकारक होता है। अतुलनीय धन प्राप्त करता है।

      दवादश भाव

      दवादश भाव

      व्यय भावस्थ केतु अपव्ययी, खर्चीला स्वभाव, चिंतातुर, सनकी, विदेश यात्री बनाता है। शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है। पैर, नेत्र व गुदा रोग से पीडि़त होता है। 45वें वर्ष में जीवनसाथी को कष्ट होता है। अंधविश्वासी और भूत-प्रेत का डर दिखाकर लोगों को ठगता है।

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