Brihaspati ka Rashi Parivartan: बृहस्पति की बदली चाल, जानिए अब कौन-कौन से योग बनेंगें? ये अच्छा है या बुरा?
Brihaspati ka rashi Parivartan: बृहस्पति (गुरु) को वैदिक ज्योतिष में अत्यंत शुभ, ज्ञान, धर्म, उच्च शिक्षा, विवाह और आध्यात्मिकता से जुड़ा हुआ माना गया है। जब बृहस्पति अन्य ग्रहों के साथ युति करता है, दृष्टि संबंध बनाता है या विशेष राशियों में गोचर करता है, तो विभिन्न प्रकार के योगों का निर्माण होता है। बृहस्पति से बनने वाले अधिकांश योग शुभ होते हैं।
ये योग जातक के जीवन पर गहरा प्रभाव डालते हैं। आइए जानते हैं बृहस्पति से बनने वाले योगों के बारे में-

गजकेसरी योग : यह योग तब बनता है जब बृहस्पति चंद्रमा से केंद्र स्थान (1, 4, 7, 10) भाव में स्थित होता है। इस योग के प्रभाव से जातक को बुद्धिमत्ता, सम्मान, धन और सामाजिक प्रतिष्ठा की प्राप्ति होती है। यह योग व्यक्ति को राजसी सुख, अच्छे निर्णय लेने की क्षमता और नेतृत्व प्रदान करता है। यदि राहु, केतु या शनि इस योग को प्रभावित करें तो इसका प्रभाव कम हो सकता है।
बृहस्पति-शुक्र युति योग : जब बृहस्पति और शुक्र एक साथ किसी भाव में स्थित हो तो युति योग बनता है। इस योग के प्रभाव से जातक को भोग और आध्यात्मिकता दोनों प्राप्त होते हैं। जातक आकर्षक व्यक्तित्व वाला, कला प्रेमी और सौंदर्यप्रिय होता है। कभी-कभी यह योग भोग-विलास की अधिकता भी देता है।
बृहस्पति-शनि युति योग उलझन पैदा कर सकता है
बृहस्पति-शनि युति योग : जब बृहस्पति और शनि जन्म कुंडली के एक ही भाव में स्थित हो तो यह युति योग बनता है। इस योग के फलस्वरूप जातक योग संयम से रहने वाला, न्यायप्रिय और गहन अध्ययन करने वाला होता है। ऐसा जातक जीवन में धीरे-धीरे प्रगति करता है लेकिन स्थायी सफलता प्राप्त करता है। यदि यह युति अशुभ भावों में हो तो धार्मिक द्वंद्व और मानसिक उलझन पैदा कर सकती है।
मान-सम्मान और अधिकार प्राप्त करता है नीचभंग राजयोग
नीचभंग राजयोग : यदि बृहस्पति अपनी नीच राशि मकर में हो लेकिन नीचभंग के कारक ग्रह से युति में हो तो उच्च के जैसा फल देता है। इस योग वाले जातक को जीवन में कठिनाइयों के बावजूद उच्च पद, मान-सम्मान और अधिकार प्राप्त होता है।
धन योग : यदि बृहस्पति द्वितीय (धन भाव), नवम (भाग्य भाव) या एकादश (लाभ भाव) में स्थित हो और शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो प्रबल धन योग बनता है। ऐसे जातक को धन, संपत्ति, आभूषण और आय के अच्छे स्रोत प्राप्त होते हैं।
राजयोग : जब बृहस्पति लग्नेश या पंचमेश होकर केंद्र या त्रिकोण में उच्च या स्वयं की राशि में स्थित हो तो राजयोग का निर्माण करता है। राजयोग वाले जातक को प्रशासन, सत्ता या नेतृत्व के क्षेत्र में विशेष सफलता मिलती है। ऐसा जातक राजनेता, मंत्री पद तक पहुंचता है।
जीवन में विद्वता और प्रतिष्ठा अर्जित कराता है विद्या योग
विद्या योग : यदि बृहस्पति पंचम भाव में हो और शुभ ग्रहों से दृष्ट हो, तो यह योग विद्या और ज्ञान का प्रतीक होता है। जिस जातक की कुंडली में यह योग होता है वह उच्च शिक्षा में सफल होता है, जीवन में विद्वता और प्रतिष्ठा अर्जित करता है।
बृहस्पति-मंगल युति (धर्म-कर्म योग) : जब कुंडली के किसी भी भाव में बृहस्पति और मंगल एक साथ हो तो यह संयोजन धर्म और कर्म को जोड़ता है। इस योग वाला व्यक्ति साहसी, धार्मिक, न्यायप्रिय और आत्मविश्वासी होता है। ऐसे जातक में नेतृत्व की प्रवृत्ति प्रबल होती है।
कला योग (बृहस्पति-चंद्र युति) : जब जन्मकुंडली में बृहस्पति चंद्र के साथ हो तो यह युति जातक को कला, लेखन, शिक्षा या धार्मिक शिक्षण की ओर प्रवृत्त करती है।
पुत्र योग : यदि बृहस्पति पंचम भाव में हो या पंचमेश से संबंध बनाए, तो यह संतान प्राप्ति में सहायक होता है। ऐसे जातक के जीवन में पुत्र अधिक होते हैं।












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