अगर बेटे या बेटी के 'मांगलिक' होने से परेशान हैं, तो जरूर क्लिक करें यहां
लखनऊ। वर या कन्या मंगली है अथवा नहीं ? मंगल दोष को बहुत सावधानी पूर्वक देखना चाहिए एंव साथ ही साथ मंगल दोष के परिहार पर भी ध्यान देना अपरिहार्य है। यदि जन्मकुण्डली में मंगल प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम एंव द्वादश भावों में से किसी भी भाव में बैठा है तो उस कुण्डली को 'मांगलिक' कहा जायेगा। दक्षिण भारत एंव उत्तर भारत के कुछ विद्वान मंगल के द्वितीय भाव में होने पर भी मॉगलिक दोष मानते है।
इसी प्रकार से जन्म कुण्डली में जहां चन्द्र स्थित हो उसको लग्न मानकर भी मांगलिक दोष की विवेचना करनी चाहिए। इसी प्राकर से कुण्डली में जॅहा शुक्र स्थित हो, उसे लग्न मानकर मंगल दोष का विचार भी करना चाहिए।
आईये आज हम चर्चा करते है कि मंगल दोष से सम्बन्धित परिहार के कुछ ऐसे नियम जिनके होने से मंगल दोष का प्रभाव नष्ट हो जाता है...

मंगल दोष का परिहार
- यदि मंगल मेष, कर्क, वृश्चिक या मकर राशि में हो तथा मंगल चतुर्थ या सप्तम भाव पर लग्न से, चन्द्र लग्न से या शुक्र लग्न से स्थित हो तो मंगल दोष का परिहार हो जाता है।
- यदि मंगल मेष, मिथुन, कन्या या वृश्चिक राशि में हो तथा मंगल द्वितीय भाव पर लग्न से, चन्द्र लग्न से या शुक्र लग्न से स्थित हो तो मंगल दोष का परिहार हो जाता है।
- अगर मंगल मेष, वृष, तुला या वृश्चिक राशि में हो तथा मंगल चतुर्थ भाव पर लग्न से, चन्द्र लग्न से या शुक्र लग्न से स्थित हो तो भी मंगल दोष नहीं माना जाता है।
- यदि मंगल कर्क, धनु, मकर या मीन राशि में हो तथा मंगल अष्टम भाव पर लग्न से, चन्द्र लग्न से या शुक्र लग्न से स्थित हो तो मंगल दोष का परिहार हो जाता है।
- अगर मंगल वृष, मिथुन, कन्या और तुला राशि में है तथा मंगल द्वादश भाव पर लग्न से, चन्द्र लग्न से या शुक्र लग्न से स्थित हो तो मंगल दोष समाप्त हो जाता हैं
- यदि वर एंव कन्या किसी एक के जन्मांग में मंगल प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश भाव में स्थिति हो तथा दूसरे के जन्मांग उक्त किसी भी भाव में शनि स्थित हो तो मंगल दोष का परिहार हो जाता है।
- सिंह लग्न और कर्क लग्न में यदि मंगल लग्न में स्थित हो तो मंगल दोष नहीं माना जाता है।
- यदि शनि प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश भाव में वर अथवा कन्या के जन्मांग में हो और दूसरे के जन्मांग में उक्त भावों में से किसी एक भाव में मंगल हो तो मंगल दोष का परिहार हो जाता है।
- अगर राहु, मंगल या शनि कुण्डली के तृतीय, षष्ठ या एकादश भावों में दूसरी कुण्डली में हो तो मंगल दोष समाप्त हो जाता है।

मेष, वृष, तुला या वृश्चिक

वर एंव कन्या

मौलिया मंगल
जन्म कुण्डली के लग्न स्थान से प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश भाव में मंगल हो तो ऐसी कुण्डली मॉगलिक कहलाती है, किन्तु उपरोक्त स्थिति यदि पुरूष की कुण्डली में हो तो वह कुण्डली मौलिया मंगल वाली जन्मपत्री कहलाती है।

चुनरी मंगल
यदि लग्न स्थान से प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश भाव में मंगल स्त्री की कुण्डली में हो तो वह कुण्डली चुनरी मंगल वाली कहलाती है।












Click it and Unblock the Notifications