जानिए ज्योतिष की लाल किताब का इतिहास

भारतीय ज्योतिष की ’लाल किताब’ विद्या परम्पराओं एंव रीति-रिवाजों पर आधारित है, जो अपने समाज में पुराने समय से प्रचलित है। इसमें ग्रहों की ज्योतिष विद्या के साथ-साथ सामुद्रिक विद्या एंव हस्त विद्या का भी समावेश है।
यह विद्या मुख्य रूप से जम्मू कशमीर, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, उत्तर प्रदेश एंव पंजाब के क्षेत्र में प्रचलित है, क्योंकि यह परम्पराओं और रीति-रिवाजों के रूप में चली आ रही थी, परन्तु लिखित रूप में ये 1940 ई. के आस-पास सामने आयी। 40 के दशक में देश में उर्दू भाषा का बोल-बाला था। इसलिए ’लाल किताब’ के पांचों भाग उर्दू भाषा में लिपिबद्ध किये गये थे।
कुछ लोगों की ये गलत धारणा थी कि इस विद्या का सम्बन्ध अरब देश है, क्योंकि इसमें जिस प्रकार से गायत्री मन्त्र आदि हिन्दू, देवी-देवताओं आदि का वर्णन है, उससे यही सिद्ध होता है कि यह भारत की ज्योतिष विद्याओं में से एक है। इसके लेखक के रूप में पं. रूपचन्द्र जोशी जो अविभाजित पंजाब के ’फरवाल’ के रहने वाले थे। वह उस समय भरतीय सेना में लेखाकार कार्य के पद पर कार्यरत थे और उनके साथ एक व्यक्ति रहता था। जो इस विद्या का ज्ञान रखता था।
उनके द्वारा बताई हुयी इस विद्या पर आधारित बातें एंव उपाय, जो सेना के कई बड़े अफसरों के बारें में एकदम सही सिद्ध हुयी तो, उन अफसरों ने यह विचार-विमर्श किया कि क्यों न इस विद्या को लिपिबद्ध कर दिया जाये।
इस प्रकार पं. रूपचन्द्र जोशी की सहायता से उस व्यक्ति ने इस विद्या को लिपिबद्ध किया। किन्तु लेखन के स्वामित्व के बारें में भ्रान्ति थी। इसलिए लाल किताब के नाम से जो पांच किताबे लिखी गयीं, उसमें लेखक के नाम का उल्लेख नहीं किया गया है।
इन किताबों के क्रम में सर्वप्रथम ’लाल किताब के फरमान’ नाम से 1939 ई0 में प्रथम पुस्तक प्रकाशित हुयी। इसका दूसरा भाग ’लाल किताब के फरमान’ नाम से 1940 ई0 में प्रकाशित किया गया। तीसरी पुस्तक ’लाल किताब के टोटके’ के नाम से 1941ई0 में प्रकाशित हुयी और तत्पश्चात चौथी पुस्तक 1942 ई0 में प्रकाशित हुयी और अन्तिम एंव पांचवी पुस्तक 1952 ई0 में प्रकाशित हुयी, जिसमें 1270 पन्ने थे और यह पूर्णतयः उर्दू भाषा में लिपिबद्ध थी।












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