इस पेड़ की खेती से 50 लाख रुपये तक कमा सकते हैं किसान, सही समय और तरीका जानिए
यूकेलिप्टस यानी नीलगिरी की खेती (eucalyptus farming) करने के लिए जुलाई से सितंबर के बीच का महीना सबसे अच्छा माना जाता है। नीलगिरी की रोपाई करने के बाद दो से तीन बार यूकेलिप्टस की कटाई की जा सकती है।
नई दिल्ली, 13 जून : यूकेलिप्टस की खेती (eucalyptus farming) से किसान लाखों रुपये का मुनाफा सकते हैं। यूकेलिप्टस को नीलगिरी और सफेदा के नाम से भी जाना जाता है। जुलाई के महीने में इसकी रोपाई की जा सकती है। अगर किसानों की जमीन खाली है या वे किसी दूसरी फसल की रोपाई का प्लान बना रहे हैं तो यूकेलिप्टस का ऑप्शन अच्छा मुनाफा कमाने का जरिया हो सकता है। अब जबकि जून महीने का दो सप्ताह खत्म हो चुका है, जुलाई आने में लगभग दो हफ्ते का समय बाकी है, किसानों के लिए ये जानना अहम है कि यूकेलिप्टस की खेती कैसे की जाए। वनइंडिया हिंदी की इस रिपोर्ट में जानिए नीलगिरी / सफेदा / यूकेलिप्टस की खेती से जुड़ी कुछ रोचक और जरूरी बातें।

पत्तियों से तेल निकालकर बनती है दवाई
नीलगिरी की खेती इमारत बनाने में लगने वाली लकड़ी के मकसद से की जाती है। यूकेलिप्टस के पेड़ काफी लंबे और सीधे होते हैं। ऐसे में भवन निर्माण में इसका काफी इस्तेमाल होता है। नीलगिरी के पत्तों से तेल निकाला जाता है। इस तेल से कई औषधियां बनाई जाती हैं। गले, नाक और पेट की बीमारी के इलाज में नीलगिरी के पत्तों का तेल काफी उपयोगी है।

पांच साल में 50 लाख तक की आमदनी
नीलगिरी यानी यूकेलिप्टस की रोपाई जुलाई से सितंबर के बीच की जा सकती है। कुछ लोगों का मानना है कि बुआई जून से अक्टूबर के बीच भी की जा सकती है। यूकेलिप्टस काफी तेजी से बढ़ने वाला और मल्टीपर्पस यानी कई कामों में इस्तेमाल किया जाने वाला पौधा है। एक एकड़ में नीलगिरी की खेती के लिए 400-500 पौधों की जरूरत पड़ेगी। इतनी जमीन पर यूकेलिप्टस तैयार होने के बाद पांच साल में 50 लाख रुपये तक कमाए जा सकते हैं।
इन किस्मों से eucalyptus farming
विशेषज्ञों के मुताबिक यूकेलिप्टस हाइब्रिड के अलावा एफआरआई-4 और 5 किस्म के नीलगिरी के पौधे अच्छी उपज देते हैं। एक बार रोपाई के बाद दो से तीन बार कटाई की जा सकती है।

इन राज्यों में नीलगिरी की खेती
नीलगिरी की रोपाई के लिए खेत में विशेष तैयारी की जरूरत नहीं पड़ती। हालांकि, बुनियादी तैयारी जरूर करनी पड़ती है। यूकेलिप्टस की बुआई से पहले खेत की गहरी जुताई कर खरपतवार निकाल लें। दोबारा जुताई करने के बाद खेत को समतल बना लेना चाहिए। पौधों की रोपाई से लगभग 20 दिन पहले एक फीट गहरा और चौड़ा गड्ढा बना लेना चाहिए। बिहार, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, मध्य प्रदेश, पंजाब और पश्चिम बंगाल के अलावा दक्षिण भारत में भी नीलगिरी की खेती बड़े पैमाने पर होती है। आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, गोवा और गुजरात में यूकेलिप्टस बड़े पैमाने पर उपजाई जाती है।

कैसे करें यूकेलिप्टस की रोपाई
कैसे करे यूकेलिप्टस की रोपाई ? इस सवाल का जवााब जानना भी मुनाफे वाली खेती के लिए काफी अहम है। किसानों के नेटवर्किंग ऐप के रूप में मशहूर Krishify ऐप पर मिली जानकारी के मुताबिक यूकेलिप्टस के पौधों की रोपाई पहले से तैयार किए गए पौधों से की जाती है। एक पौधे से दूसरे की दूरी लगभग 3 फीट रखी जाती है। इससे पौधों को पूरी तरह विकसित होने का समय मिलता है।
eucalyptus farming में उर्वरक
अच्छी पैदावार के लिए बागवानी, वानिकी और सामान्य फसल की खेती में भी उर्वरकों के इस्तेमाल का सुझाव दिया जाता है। हालांकि, हर मिट्टी की तरह यूकेलिप्टस की खेती में भी उर्वरक का प्रयोग मिट्टी की जांच के बाद ही करें। किसान यूकेलिप्टस के साथ गन्ने की खेती कर सकते हैं। इसे सहफसली खेती या एक फसल के साथ दूसरे फसल की खेती भी कहा जाता है। दोनों एक साथ बोए जाने पर अच्छी पैदावार भी देते हैं।

यूकेलिप्टस की सिंचाई
किसी भी फसल की अच्छी पैदावार में सिंचाई की अहम भूमिका होती है। बागवानी और वानिकी में भी पानी की सही मात्रा का ज्ञान जरूरी है। यूकेलिप्टस यानी नीलगिरी में यूं तो अधिक पानी की जरूरत नहीं होती, लेकिन रोपाई के समय अगर बारिश नहीं हुई है तो सिंचाई जरूर करें। यूकेलिप्टस सूखे को अच्छे से झेल लेता है, लेकिन पौधा अच्छे से विकसित हो इसके लिए नियमित सिंचाई का सुझाव दिया जाता है। एक एकड़ में नीलगिरी की खेती करने पर 5 साल में एक पेड़ से 400 किलो तक लकड़ी मिल जाती है। इस आधार पर एक एकड़ में यूकेलिप्टस सेस 50 लाख तक की आमदनी हो सकती है।
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