टीडीपी की कैसे पार लगेगी नाव, क्या फिर गठबंधन के रास्ते पर? जानिए बड़ी बातें

टीडीपी के महासचिव व एनसी नायडू के बेटे नारा लोकेश पिछले कई दिनों से दिल्ली में हैं। वे सुप्रीम कोर्ट से कौशल विकास विकास निगम घोटाला मामले में आरोपी अपने पिता व टीडीपी प्रमुख को एनसी नायडू को राहत दिलाने का प्रयास कर रहे हैं। उसके लिए लोकेश इन दिनों वरिष्ठ अधिवक्ताओं से सलाह-मशविरा कर रहे हैं। इसके साथ ही टीडीपी नेता एन चंद्रबाबू नायडू के लिए समर्थन जुटाने की कोशिश भी कर रहे हैं।

पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी समेत कई नेताओं ने पूर्व सीएम व टीडीपी प्रमुख एन चंद्रबाबू नायडू की गिरफ्तारी के तरीके की निंदा की है। हालांकि कोई भी नेता इस समय टीडीपी के साथ इस मुद्दे पर खड़ा होने के लिए मुखर नहीं है। तेलंगाना बीजेपी प्रमुख दग्गुबाती पुरंदेश्वरी टीडीपी प्रमुख एन सी नायडू की पत्नी की बहन हैं। उन्होंने भी टीडीपी प्रमुख की गिरफ्तारी के तरीके पर निंदा की है। लेकिन वो भी इस मुद्दे पर टीडीपी के साथ खड़ी नहीं हो पा रही हैं। उनका कहना है कि वे बीजेपी हाईकमान के निर्णयों को पालन करेंगी।

TDP again follow path of alliance

जबकि ये लगभग साफ हो चुका है की बीजेपी टीडीपी के साथ नहीं खड़ी होगी। ये बात सूत्रों से मिले एक एक इनपुट के आधार पर कही जा रही है। जिसमें कहा गया कि नारा लोकेश ने गृह मंत्री अमित शाह सहित भाजपा के शीर्ष नेताओं से मिलने का समय मांगा था, लेकिन उन्हें निराशा हाथ लगी। लेकिन टीपीपी और बीजेपी के बीच इन नजदीकियों के पुख्त सबूत नहीं मिले हैं। ऐसे में सूत्रों की खबरों को लेकर दावा नहीं किया जा सकता। वहीं दूसरी ओर टीडीपी नेता इस बात कायम हैं कि चंद्रबाबू नायडू को गलत तरीके से फंसाया जा रहा है, वे निर्दोष हैं।

वहीं दूसरी ओर टीडीपी के इतिहास पर नजर डालें तो पार्टी ने चुनाव जीतने के लिए अक्सर गठबंधन की राह पकड़ी है। इस बार तो पार्टी प्रमुख की गिरफ्तारी के बाद टीडीपी को किसी मजबूत स्तंभ की तलाश है। अगर टीडीपी के भाजपा के साथ गठबंधन की बात करें तो इसमें पार्टी को सफलता मिली। लेकिन 2019 में कांग्रेस के साथ गठबंधन से टीडीपी को नुकसान हुआ।

लेकिन अब टीडीपी कठिन परिस्थितियों में किसके साथ गठबंधन करेगी, ये एक बड़ा सवाल है। पार्टी नेताओं का कहना है कि चुनावी गठबंधन के लिए भाजपा 10-12 लोकसभा सीटें और कम से कम 50 विधानसभा सीटें मांग सकती है। वहीं दूसरी ओर सूत्रों के मुताबिक आगर भाजपा-जनसेना भारी बहुमत मिलता है तो टीडीपी को नुकसान अधिक होगा। ऐसे में टीडीपी का अगर अकेले जनसेना के साथ गठबंधन हो तो बेहतर होगा।

लेकिन टीडीपी के लिए जनसेना का भाजपा से अलग होना संभव नहीं है। ऐसे में अब एननी नायडू और उनकी पार्टी के लिए एकमात्र विकल्प एक बार फिर कांग्रेस से हाथ मिलाना ही बचा है। लेकिन विडंबना ये है कि टीडीपी का गठन ही वैचारिक रूप से कांग्रेस से लड़ने के लिए किया गया था। ऐसे में इस गठबंधन की सफलता की गारंटी नहीं दी जा सकती। हालांकि टीडीपी के पास कांग्रेस से हाथ मिलाने के अलावा कोई दूसरा विकल्प भी नहीं है।

यह विश्वसनीय रूप से पता चला है कि लोकेश ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी से मिलने का समय मांगा है। समझा जाता है कि गिरफ्तारी से पहले नायडू ने कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार से भी बात की थी। लेकिन राहुल को टीडीपी उद्धारकर्ता की भूमिका निभाने की कोई जल्दी नहीं है। कांग्रेस के लिए तेलंगाना में सीटें निकालना काफी अहम है। ऐसे में पार्टी गंभीरता से विचार करने के बाद ही कोई कदम उठाएगी। ऐसे में तेलंगाना में नायडू के साथ कोई भी गठबंधन मददगार की भूमिका में नहीं हो सकता। वर्ष 2018 में हुए चुनावों पर नजर डालें तो ये बात साफ हो जाती है। फिर भी अगर कांग्रेस टीडीपी के प्रति सहानुभूति दिखाती है तो चीजें बदल सकती हैं।

लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में ऐसा नहीं लगता कि कोई भी राष्ट्रीय दल टीडीपी के साथ खड़ा होगा। ऐसे में पार्टी को बचाने का एकमात्र तरीका उसके कैडर को एकजुट करना और नेतृत्व में कमी को जल्दी से पूराना करना होगा।

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