तेलंगाना: दलित-आदिवासी मतदाता एससी-एसटी निर्वाचन क्षेत्र में निभाएंगे महत्वपूर्ण भूमिका
तेलंगाना चुनाव में अब कुछ ही दिन बचे हैं। इस चुनाव में सभी पार्टियां पूरी ताकत झोंक दी हैं। तेलंगाना में दलित और आदिवासी राज्य के मतदाताओं का लगभग एक-चौथाई हिस्सा हैं। एससी और एसटी आरक्षित सीटें भी विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों का एक-चौथाई हिस्सा हैं, तेलंगाना में वर्तमान चुनावों के नतीजे में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
एससी और एसटी पूरे राज्य में फैले हुए हैं और आरक्षित और सामान्य श्रेणी दोनों निर्वाचन क्षेत्रों में उनकी महत्वपूर्ण ताकत है। प्रमुख प्रतिस्पर्धी दल-बीआरएस, कांग्रेस और भाजपा-उन्हें बड़े-बड़े चुनावी वादों से लुभा रहे हैं।

जबकि कांग्रेस "चेवेल्ला एससी और एसटी घोषणापत्र लेकर आई है। वहीं भाजपा ने एससी आरक्षण के वर्गीकरण को तेजी से पूरा करने का वादा किया है। जो पिछले दो दशकों से लटका हुआ है। ग्रैंड ओल्ड पार्टी ने एससी और एसटी के लिए आरक्षण को 18 और 12 प्रतिशत तक बढ़ाने का आश्वासन दिया है।
बीजेपी यह भी सुनिश्चित करना चाहती है कि एससी और एसटी को प्रदान किया गया आरक्षण राज्य में उनकी आबादी के अनुरूप हो। इसके अलावा भाजपा ने घोषणा की है कि वह पिछड़े मुसलमानों के लिए 4 प्रतिशत कोटा खत्म कर देगी और इसे एससी-एसटी और बीसी के बीच बांट देगी।
कांग्रेस की दलित बंधु योजना का नाम बदलकर अम्बेडकर अभय हस्तम करने और इसे एससी और एसटी दोनों तक विस्तारित करने और प्रति परिवार वित्तीय सहायता 12 लाख रुपये तक बढ़ाने की योजना है। आरक्षण को निजी शिक्षण संस्थानों में प्रवेश और निजी क्षेत्र की नौकरियों तक बढ़ाया जाएगा। गृह लक्ष्मी का नाम बदलकर "इंदिरम्मा पक्का मकान" योजना रखते हुए कांग्रेस ने राज्य में प्रत्येक एससी और एसटी परिवार को घर बनाने के लिए जगह और 6 लाख रुपये की सहायता देने का वादा किया है।
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