मध्य प्रदेशः सीएम पद के लिए कमलनाथ दिग्विजय सिंह में बढ़ा तनाव, सिंधिया के बाद अब किसने खड़ी की मुश्किल
पसी टूट-फूट के कारण 2020 में सत्ता गंवाने वाली कांग्रेस के लिए 2023 में भी अंदरूनी गुटबाजी से निपटना सबसे बड़ी चुनौती रहेगा। विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के अंदरखाने में सीएम के चेहरे को लेकर तकरार बढ़ने लगी है।

ग्वालियरः विधान सभा चुनाव सिर पर हैं और कांग्रेस अपनी गुटबाजी से ही नहीं उबर पा रही है। कांग्रेस के क्षत्रपों दिग्विजय-कमलनाथ और सिंधिया की एकजुटता ने ही 2018 में पार्टी को सत्ता दिलवायी थी। लेकिन अब फिर वही हाल हैं। सिंधिया के जाने का नुकसान झेल रही कांग्रेस में अब कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के बीच भी कुछ खींचतान सी चल रही है। मसला ये है कि 2023 में सीएम पद का चेहरा कौन होगा।
आपसी टूट-फूट के कारण 2020 में सत्ता गंवाने वाली कांग्रेस के लिए 2023 में भी अंदरूनी गुटबाजी से निपटना सबसे बड़ी चुनौती रहेगा। विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के अंदरखाने में सीएम के चेहरे को लेकर तकरार बढ़ने लगी है। चुनाव से पहले सीएम पद को लेकर कमलनाथ और दिग्विजय गुट में खींचतान बढ़ गई है। एमपी कांग्रेस में कमलनाथ के समर्थक उन्हें भावी मुख्यमंत्री मानकर पोस्टर बाजी कर रहे हैं। वहीं दिग्विजय खेमे के अरुण यादव ने कह दिया कि सीएम का चेहरा दिल्ली से तय होगा। बढ़ती तकरार के बाद पीसीसी चीफ कमलनाथ को भी कहना पड़ा कि वो किसी पद की तलाश में नहीं हैं। उन्होंने जीवन में बहुत कुछ प्राप्त कर लिया है।
कांग्रेस में घमासान
साल 2018 में कांग्रेस ने 15 साल बाद अपनी खोई जमीन हासिल करते हुए मध्य प्रदेश में सरकार बनाई थी। उसके पीछे पार्टी नेताओं की एकजुटता की प्रमुख कारण थी। लेकिन 2 साल बाद ही 2020 में कांग्रेस की अंदरूनी गुटबाजी औऱ सिंधिया के दलबदल के कारण कमलनाथ सत्ता से बाहर हो गए थे। कमोबेश 2023 के विधानसभा चुनाव से पहले भी कांग्रेस में इसी तरह के अंदरूनी टकराव के हालात बन रहे हैं। कमलनाथ का गुट उन्हें भावी मुख्यमंत्री मानकर चल रहा है। इसके लिए बकायदा कार्यक्रमों के दौरान पोस्टर बाजी में भी कमलनाथ को भावी सीएम बताया जा रहा है। उधर दिग्विजय खेमे के लोग भी अंदरूनी तौर पर कमलनाथ के खिलाफ लामबंद हो गए हैं। दिग्विजय के खास समर्थक पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव ने तो सार्वजनिक तौर पर यह कह दिया कि सीएम का चेहरा दिल्ली से तय होता है।
अरुण यादव ने कहा -दिल्ली से तय होता है सीएम
मध्य प्रदेश कांग्रेस में अब तक साथ साथ चल रहे कमलनाथ और दिग्विजय गुट एक-दूसरे की खिलाफत में जुट गए हैं। दिग्विजय गुट के कट्टर समर्थक माने जाने वाले पूर्व पीसीसी चीफ अरुण यादव ने तो मैदान में आकर कमलनाथ के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। अरुण यादव ने कहा 2018 में भी हमें ग्वालियर चंबल के साथ ही मध्य प्रदेश से अच्छी सीटें मिली थीं और हमने सरकार बनाई थी। इस बार भी जनता का रुझान कांग्रेस की तरफ है। 2023 के विधानसभा चुनाव में भी हम बेहतर जीत हासिल कर सरकार बनाएंगे। सीएम के चेहरे को लेकर किए गए सवाल पर उन्होंने कहा "सीएम दिल्ली से तय होता है"।
कमलनाथ बोले- मैं पद की खोज में नहीं, मैंने बहुत कुछ पा लिया
अरुण यादव के बयान के बाद मध्यप्रदेश में कांग्रेस के अंदर खाने की लड़ाई बयानों के जरिए बाहर आने लगी है। अरुण यादव के बयान ने कांग्रेस के अंदरूनी टकराव में आग में घी का काम किया है। अरुण यादव के इस बयान के बाद आखिरकार कमलनाथ को चुनावी शंखनाद करने के पहले ग्वालियर में इसका जवाब देना पड़ा। पत्रकारों ने अरुण यादव के बयान का हवाला देकर कमलनाथ से सवाल किया कि आखिरकार कांग्रेस में सीएम का चेहरा कौन होगा? इस पर " पीसीसी चीफ कमलनाथ ने कहा मैं किसी पद की खोज में नहीं हूं। मैंने अपने जीवन में बहुत कुछ प्राप्त कर लिया है। अब मैं मध्यप्रदेश का भविष्य सुरक्षित करना चाहता हूं, यह मेरा लक्ष्य है।
15 साल बाद हासिल हुई सत्ता, 15 महीने में गंवाई
साल 2018 में 15 साल बाद कांग्रेस ने जोरदार प्रदर्शन करते हुए मध्य प्रदेश में सत्ता में वापसी की थी और कमलनाथ मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे। लेकिन बाद में ज्योतिरादित्य सिंधिया और दिग्विजय गुट के बीच चल रही लड़ाई ने कांग्रेस को तोड़ दिया था और 2020 में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस का हाथ छोड़ भाजपा का फूल थाम लिया था। सिंधिया और दिग्विजय के गुटीय संघर्ष के कारण कमलनाथ की सरकार चली गई थी। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि 2023 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के खिलाफ उतरने से पहले कांग्रेस को अपने अंदर खाने में चल रही तकरार को रोकना होगा। अगर ऐसा नहीं हुआ तो कांग्रेस की लिए गुटबाजी के कारण 2023 के नतीजे निराशाजनक हो सकते हैं।












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