Vishwakarma Puja 2022: आज है विश्वकर्मा जयंती, जानें पूजा का शुभ-मुहूर्त, विधि, आरती और कथा

नई दिल्ली, 16 सितंबर। ब्रह्मांड के सबसे पहले वास्तुकार, इंजीनियर भगवान विश्वकर्मा की जयंती हर साल 17 सितंबर को मनाई जाती है। इस दिन लोग कारखानों और दुकानों में मशीनों की पूजा करते हैं। वैसे तो भगवान विश्वकर्मा की जयंती पूरे देश में मनाई जाती है लेकिन कर्नाटक, असम, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, ओडिशा, त्रिपुरा में बड़े पैमाने पर मनाई जाती है। माना जाता है कि गुरु विश्वकर्मा की पूजा करने से इंसान के कारोबार में हमेशा वृद्धि होती रहती है और कभी भी उसमें कोई विघ्न नहीं आता है।

क्या है पूजा का शुभ मुहूर्त

क्या है पूजा का शुभ मुहूर्त

पूजा के लिए तीन शुभ मुहूर्त हैं लेकिन विश्वकर्मा भगवान की पूजा आप दिन में कभी भी कर सकते हैं क्योंकि जंयती पूरे दिन रहेगी।

  • पहला मुहूर्त: 17 सितंबर 2022 को 07.39 AM - 09.11 AM
  • दूसरा मुहूर्त: 17 सितंबर 2022 को 01.48 PM - 03.20 PM
  • तीसरा मुहूर्त - 17 सितंबर 2022 को 03.20 PM - 04.52 PM
  • अमृत सिद्धि योग - 17 सितंबर 2022 को 06.13 AM - 12.21 PM
  • द्विपुष्कर योग - 17 सितंबर 2022 को 12.21 PM- 02.14 PM
पूजा विधि

पूजा विधि

  • सबसे पहले स्नान करके स्वच्छ कपड़े पहने।
  • फिर भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा या चित्र की पूजाकरें।
  • अक्षत, हल्दी, फूल, पान, लौंग, सुपारी, मिठाई, फल, धूप, दीप और रक्षासूत्र से पूजा शुरू करें।
  • इसके बाद समस्त मशीनों, उपकरणों आदि की पूजा करें।
  • आरती करें, प्रार्थना करें और प्रसाद बांटे।
आरती

आरती

  • ॐ जय श्री विश्वकर्मा प्रभु जय श्री विश्वकर्मा।
  • सकल सृष्टि के कर्ता रक्षक श्रुति धर्मा॥
  • आदि सृष्टि में विधि को, श्रुति उपदेश दिया।
  • शिल्प शस्त्र का जग में,ज्ञान विकास किया ॥
  • ऋषि अंगिरा ने तप से,शांति नही पाई।
  • ध्यान किया जब प्रभु का,सकल सिद्धि आई॥
  • रोग ग्रस्त राजा ने,जब आश्रय लीना।
  • संकट मोचन बनकर,दूर दुख कीना॥
  • जब रथकार दम्पती, तुमरी टेर करी।
  • सुनकर दीन प्रार्थना,विपत्ति हरी सगरी॥
  • एकानन चतुरानन,पंचानन राजे।
  • द्विभुज, चतुर्भुज,दशभुज,सकल रूप साजे॥
  • ध्यान धरे जब पद का,सकल सिद्धि आवे।
  • मन दुविधा मिट जावे,अटल शांति पावे॥
  • श्री विश्वकर्मा जी की आरती, जो कोई नर गावे।
  • कहत गजानन स्वामी, सुख सम्पत्ति पावे॥
क्या है कथा

क्या है कथा

कहा जाता है कि सृष्टि के जनक ब्रह्मा के पुत्र धर्म थे और उनके बेटे का नाम वास्तुदेव था। जो कि बहुत बड़े शिल्पकार थे। उनका विवाह अंगिरसी नामक स्त्री से हुआ था। उन्हीं के गर्भ से भगवान विश्वकर्मा का जन्म हुआ था। जो कि अत्यंत पराक्रमी, बुद्धिजीवी और बलशाली थी, उनके अंदर अपने पिता की तरह वास्तुकला का गुण विद्यमान था। उन्होंने ही कई वस्तुओं का आविष्कार किया था। कहा जाता है कि एक बार राक्षसों ने सभी देवताओं का जीना मुश्किल कर दिया था।

महर्षि दधीचि की हड्डियों से वज्र तैयार किया

महर्षि दधीचि की हड्डियों से वज्र तैयार किया

तब विश्वकर्मा ने महर्षि दधीचि की हड्डियों से एक कठोर वज्र तैयार किया था, जिससे ही इंद्र ने असुरों का संहार किया था। माना जाता है कि उन्होंने ही रावण की लंका बनाई थी , यही नहीं उन्होंने ही कृष्ण नगरी द्वारिका, पांडवों के लिए हस्तिनापुर को बनाया था।

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