आज सोमवती अमावस्या, शनि जयंती और वट सावित्री व्रत एक साथ, जानिए पूजा विधि और शुभ मुहूर्त

नई दिल्ली। ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या को मनाए जाना वाला वट सावित्री व्रत आज है, सौभाग्य से आज ही शनि जयंती और सोमवती अमावस्या भी है, आज ही सर्वार्थ सिद्धी एवं अमृत सिद्धि योग होने से दुर्लभ योग संयोग बन रहा है, इस संयोग में किए गए दान-पुण्य से पितृ दोष में शांति, शनिदेव की कृपा और सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है, ऐसा दुर्लभ संयोग बहुत कम आता है इसलिए आज का दिन बेहद पावन है।

वट सावित्री व्रत

वट सावित्री व्रत

आज के दिन पूरे उत्तर भारत में सुहागिनें 16 श्रृंगार करके बरगद के पेड़ चारों फेरें लगाकर अपने पति के दीर्घायु होनें की प्रार्थना करती हैं। प्यार, श्रद्धा और समर्पण का यह व्रत सच्चे और पवित्र प्रेम की कहानी कहता है।

आज का शुभ मुहूर्त

विजय मुहूर्त दोपहर 2 बजकर 37 मिनट से 3 बजकर 31 मिनट तक। सर्वार्थ सिद्धि योग आज पूरे दिन रहेगा।

अखंड सौभाग्यवती रहने का आशीष मिलता है

अखंड सौभाग्यवती रहने का आशीष मिलता है

भारतीय धर्म में वट सावित्री पूजा स्त्रियों का महत्वपूर्ण पर्व है, जिसे करने से हमेशा अखंड सौभाग्यवती रहने का आशीष प्राप्त होता है। कथाओं में उल्लेख है कि जब यमराज सत्यवान के प्राण लेकर जाने लगे तब सावित्री भी यमराज के पीछे-पीछे चलने लगी। यमराज ने सावित्री को ऐसा करने से रोकने के लिए तीन वरदान दिये। एक वरदान में सावित्री ने मांगा कि वह सौ पुत्रों की माता बने। यमराज ने ऐसा ही होगा कह दिया। इसके बाद सावित्री ने यमराज से कहा कि मैं पतिव्रता स्त्री हूं और बिना पति के संतान कैसे संभव है?

चने का प्रसाद

सावित्री की बात सुनकर यमराज को अपनी भूल समझ में आ गयी कि,वह गलती से सत्यवान के प्राण वापस करने का वरदान दे चुके हैं। इसके बाद यमराज ने चने के रूप में सत्यवान के प्राण सावित्री को सौंप दिये। सावित्री चने को लेकर सत्यवान के शव के पास आयी और चने को मुंह में रखकर सत्यवान के मुंह में फूंक दिया। इससे सत्यवान जीवित हो गया इसलिए वट सावित्री व्रत में चने का प्रसाद चढ़ाने का नियम है।

वृक्ष की परिक्रमा

वृक्ष की परिक्रमा

जब सावित्री पति के प्राण को यमराज के फंदे से छुड़ाने के लिए यमराज के पीछे जा रही थी उस समय वट वृक्ष ने सत्यवान के शव की देख-रेख की थी। पति के प्राण लेकर वापस लौटने पर सावित्री ने वट वृक्ष का आभार व्यक्त करने के लिए उसकी परिक्रमा की इसलिए वट सावित्री व्रत में वृक्ष की परिक्रमा का भी नियम है।

ऐसे करें वट सावित्री व्रत

सुहागन स्त्रियां वट सावित्री व्रत के दिन सोलह श्रृंगार करके सिंदूर, रोली, फूल, अक्षत, चना, फल और मिठाई से सावित्री, सत्यवान और यमराज की पूजा करें। वट वृक्ष की जड़ को दूध और जल से सींचें। इसके बाद कच्चे सूत को हल्दी में रंगकर वट वृक्ष में लपेटते हुए कम से कम तीन बार परिक्रमा करें। वट वृक्ष का पत्ता बालों में लगाएं। पूजा के बाद सावित्री और यमराज से पति की लंबी आयु एवं संतान हेतु प्रार्थना करें।

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