Sindoor or Kumkum: सिंदूर एक श्रृंगार नहीं बल्कि आस्था और वचन है
नई दिल्ली। हिंदू धर्म में किसी भी शुभ काम की शुरूआत बिना 'कुमकुम' के नहीं होती नहीं है, 'कुमकुम' हिंदू रिवाज में काफी उच्च और प्रमुख स्थान रखता है। 'कुमकुम' का मतलब खुशी से होता है और बिना खुशी के तो कोई शुभ काम संभव नहीं है। यही नहीं 'कुमकुम' को मां लक्ष्मी का प्रमुख श्रृंगार मानते हैं इस कारण दिवाली पर मेन डोर पर 'कुमकुम' से मां के पैर बनाते हैं। वैसे 'कुमकुम' मां दुर्गा का भी प्रिय श्रृंगार है, इसे शक्ति का भी मानक कहते हैं, इस कारण बिना इसके नवरात्र की पूजा अधूरी होती है।

भगवान राम के पास हमेशा रहें
कहते हैं 'कुमकुम' यानी सिंदूर से हनुमान जी ने अपने आपको रंग लिया था सिंदूर का लेपन बजरंगबली ने इसलिए किया था जिससे वो अपने प्रिय भगवान राम के पास हमेशा रहें, इसलिए कुमकुम या सिंदूर से पूजा करके हम बजरंगबली की कृपा पा सकते हैं।

दुल्हन का आगमन नहीं
'कुमकुम' के बिना नई दुल्हन का आगमन नहीं होता है इस कारण जब नई दुल्हन घर आती है तो उसे 'कुमकुम' मिले पानी में पैर भिगोकर आना होता है।

सौभाग्य का मानक
'कुमकुम' एक विवाहिता के लिए सौभाग्य का मानक है इसलिए कोई ब्याहता बिना 'कुमकुम' के घर से बाहर नहीं निकलती है।

बुरी दृष्टि नहीं
सरसों के तेल में 'कुमकुम' भिगोकर दरवाजे पर लगाने से घर-परिवार वालों पर बुरी दृष्टि नहीं पड़ती है।लोगों हर शुभ काम करने के बाद कुमकुम से ही स्वास्तिक बनाते हैं।

कुमकुम स्त्री शक्ति का प्रतीक
विद्वानों के अनुसार लाल रंग शक्ति और उर्जा का प्रतीक है और यह देवी पार्वती या सती की शक्ति का प्रतीक है जो शक्ति का प्रतीक हैं।












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