Shani Pradosh Vrat 2026: शनि प्रदोष पर लगा दिशाशूल, क्या है नियम? पंडित दयानंद ने बताए बचने के उपाय
Shani Pradosh Vrat 2026: आज शनि प्रदोष का व्रत है, हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। जब प्रदोष व्रत शनिवार के दिन पड़ता है, तो उसे शनि प्रदोष व्रत या शनि त्रयोदशी कहा जाता है। काशी के पंडित दयानंद शास्त्री के मुताबिक 'आज विधि-विधान से भगवान शिव की पूजा करने और प्रदोष काल में दीप अर्पित करने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं और सुख-शांति की प्राप्ति होती है।'
लेकिन आज दिशाशूल भी है, दयानंद शास्त्री ने कहा कि 'पूर्व दिशा में दिशाशूल लगा है, यदि किसी कारणवश इस दिशा में यात्रा करनी पड़े तो अदरक या उड़द का सेवन करके और ईश्वर का स्मरण करके यात्रा शुरू करना शुभ माना जाता है अन्यथा धन और सेहत दोनों की परेशानी झेलनी पड़ती है।'

क्या होता है दिशाशूल?
दयानंद शास्त्री ने कहा कि ' दिशाशूल भारतीय ज्योतिष और पंचांग में एक पारंपरिक मान्यता है। इसका अर्थ है किसी विशेष दिन किसी विशेष दिशा में यात्रा करना अशुभ माना जाना। सप्ताह के प्रत्येक दिन के लिए एक दिशा निर्धारित की जाती है, जिसे उस दिन का दिशाशूल कहा जाता है।'
- दिन -दिशाशूल
- सोमवार -पूर्व
- मंगलवार- उत्तर
- बुधवार -उत्तर
- गुरुवार- दक्षिण
- शुक्रवार- पश्चिम
- शनिवार- पूर्व
- रविवार- पश्चिम
क्या है दिशाशूल से बचने के नियम?
यदि दिशाशूल वाली दिशा में यात्रा करनी हो, तो पहले कुछ विशेष उपाय (जैसे दही, गुड़, धनिया, पान आदि का सेवन) करके यात्रा शुरू करनी चाहिए, ऐसा माना जाता है कि दिशाशूल की दिशा में यात्रा करने से धन हानि
होती है सेहत खराब होती है।
पूजा की विधि और अभिषेक का महत्व
शनि प्रदोष के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करने के बाद साफ वस्त्र धारण करने चाहिए। इसके बाद हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प करें। दिनभर श्रद्धापूर्वक फलाहार या पूर्ण उपवास का पालन करते हुए मन को शांत रखें। संध्या के समय, जब सूर्यास्त होने वाला हो, तब महादेव की विशेष पूजा करनी चाहिए।
शिवलिंग का अभिषेक करना सबसे फलदायी
प्रदोष काल में शिवलिंग का अभिषेक करना सबसे फलदायी माना गया है। शिवभक्तों को जल, गाय के कच्चे दूध, दही, शहद, शुद्ध घी और गंगाजल से शिवलिंग का अभिषेक करना चाहिए। इसके बाद शिवलिंग पर चंदन का तिलक लगाकर बेलपत्र, धतूरा, भांग, अक्षत, फूल और ऋतु फल अर्पित करने चाहिए।
'ॐ नमः शिवाय' मंत्र का जाप करना चाहिए
पूजा के दौरान भक्तों को निरंतर 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र का जाप करना चाहिए। इसके बाद शांत मन से शनि प्रदोष व्रत की पौराणिक कथा का श्रवण या पाठ करना चाहिए। पूजा के अंत में शिव चालीसा और भगवान शिव की आरती करके उपस्थित लोगों में प्रसाद वितरित करना चाहिए।














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