कविता: कट जाती पूरी उम्र है- रिश्ते अनमोल बनाने में

'बनते है रिश्ते कई - इस चितचोर जमाने में !
अग्नि परीक्षा होती है-सबको इक साथ निभाने में !!'

'रिश्तो कि यह प्रिय-प्रत्यंचा - सर साथ होती मोहक है!
गर छूट गयी निज हांथ से-होती प्रलय सम विद्रोहक है !!'

'इन रिश्तो की हर डोरी को - सहेज हम कनक सा रखते है !
हर कर्म् करते इनके लिये -न परहेज हम तनक सा रखते है!!'

'कट जाती पूरी उम्र है- रिश्ते अनमोल बनाने में !
लट जाती पूरी रसना है- मीठे दो बोल सुनाने में !!'

'बट जाती पूरी दुनिया है- इनका इक मोल भुनाने में!
है लगता इक भी पल नही-विष इनको घोल पिलाने में!!'

इसलिये--

'गर दिये है रब ने रिश्ते अनेक-इस चितचोर जमाने में!
सो सहेज सको सबको सदा- ऐसा मांगो कुछ पाने में !!'

ऐसा मांगो कुछ पाने में-----------

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