त्रिदेवों ने अनुसूया के सामने रखी अजीब शर्त, दिलचस्प है चंद्रमा के जन्म की कहानी

नई दिल्ली। साल 2021 में 28 फरवरी से फाल्गुन मास प्रारंभ हो चुका है। माना जाता है कि इसी महीने में चंद्रमा का जन्म हुआ था, इसलिए फाल्गुन में चंद्रमा अपनी पूजा करने वालों पर भरपूर कृपा बरसाते हैं। यह महीना 28 मार्च, 2021 को समाप्त होगा। हम यहां उनके जन्म से जुड़ी कुछ प्रचलित कहानियां बता रहे हैं।

दिलचस्प है चंद्रमा के जन्म की कहानी, Must Read

ऋषि अत्रि और अनुसूया के पुत्र थे चंद्रमा

हरिवंश पुराण के अनुसार, ब्रह्मा ने सृष्टि के आरंभ में 7 मानस पुत्रों को अवतरित किया, जो पूर्णतः वैराग्य की ओर उन्मुख थे। उन्हीं में से एक थे ऋषि अत्रि और उनकी पत्नी अनुसूया थीं, जिनके पतिव्रत धर्म की चर्चा अक्सर होती है। उन्होंने चंद्रमा को पुत्र के रूप में पाने की कामना की और अत्यंत श्रद्धाभाव से उनका ध्यान किया। इससे उनके नेत्रों से ऐसी द्युति यानी ज्योति निकली जो चंद्रमा के समान कांतिवान थी। दशों दिशाएं इस ज्योति को अपने गर्भ में लेकर पोषण करने लगीं, लेकिन यह तेज दसों दिशाओं से पल न सका और पृथ्वी पर गिर पड़ायही कांतियुक्त, लेकिन शक्तिहीन चंद्रमा हुए।

ब्रह्मा ने कराई 21 बार पृथ्वी की परिक्रमा

इस शक्तिहीन चंद्रमा को ब्रह्माजी ने उठाकर अपने रथ में बिठा लिया और पृथ्वी की 21 बार परिक्रमा करवाई। साथ ही वेद मंत्रोच्चारण के द्वारा दसों दिशाओं की शक्ति दिलवाई। इस प्रकार चंद्रमा को जीवन प्राप्त हुआ। चंद्रमा को बीज, औषधि, जल और ब्राह्मणों का स्वामित्व मिला। चंद्रमा परिक्रमा के दौरान पृथ्वी पर औषधि और अन्य प्रकार के बीजों की वर्षा करते रहे। इससे सभी देवताओं, पितरों, मनुष्यों, भूत-प्रेत, पशु-पक्षी और वृक्षों आदि के प्राणों का पोषण होता है।

त्रिदेवों ने अनुसूया के सामने रखी थी निर्वस्त्र होने की शर्त

श्रीमद्भागवत में चंद्रमा के जन्म की एक अन्य कहानी बताई गई है। ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों एक बार अनुसूया के पातिव्रत्य की परीक्षा लेने के लिए भिक्षुओं का वेश धरकर उनके पास गए। त्रिदेव ने भिक्षा लेने की बड़ी अजीब शर्त रखी। उन्होंने कहा कि माता को उन्हें निर्वस्त्र होकर भोजन कराना होगा। माता अनुसूया उनकी लीला समझ गईं और उन्होंने तीनों देवताओं को अपने पतिव्रत के बल पर नवजात शिशु में परिवर्तित कर दिया, फिर निर्वस्त्र होकर भोजन कराया। इस प्रक्रिया में उनका मातृत्व जाग गया और उन्होंने संतान की कामना की। उन्हें तीन पुत्र क्रमशः दत्तात्रेय, चंद्रमा और दुर्वासा प्राप्त हुए। इस प्रकार, चंद्रमा एक छल से जुड़ गए और मन तो छली होता है।

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