मी़डिया ज्यादा सशक्त हुआ हैः शशि शेखर

शुरुआती दौरः बीएचयू, पुराने सिक्के और अखबारनवीसी
जब मैं बी.एच.यू. में एम.ए. प्रीवियस में पहुंचा तो मेरा लिखना शुरू हो चुका था। मैं आगरा से वहां गया था। तब तक मेरे लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में आ चुके थे। अत: युवा पत्रकारों ने मेरा गर्मजोशी से स्वागत किया। तब तक बनारस इस तरह मरा नहीं था। तब तक मैं मुद्रा पर काम करना चाह रहा था। पुरानी चीजें, पुरानी इमारतें, पुराने सिक्के और पुरानी दुश्मनियां भी मुझे पसंद हैं। ..मुझे अपनी पढ़ाई और जेब खर्च के लिए पैसों की जरूरत थी। मैंने हमेशा पढ़ाई अपने पैसों के बल पर ही पूरी की थी। इसके पीछे मेरे पिताजी की वह भावना भी थी कि अमरीका जैसे विकसित देश में भी बच्चे अपने जेब खर्च के लिए हॉकिंग करते हैं। तो इस तरह से मेरा जुड़ाव आज अखबार से हो गया। तब उसके संपादक राममोहन पाठक थे। 'आज' से मैं जुड़ तो रहा था लेकिन वहां का पूरा माहौल सड़ा हुआ सा था। बैठने तक का स्थान निहायत गंदा था तथा अदना से पुलिस का सिपाही आकर ब्यूरो चीफ तक को हडक़ा लेता था और ब्यूरो चीफ बेचारा एक छोटे से बुलावे पर इलाके के इंस्पेक्टर के यहां हाजिरी देने पहुुंच जाता था। उसमें काम करने वाले प्राय: गुरबत के सताए हुए लोग थे और अपनी विद्वता के बोझ से दबे हुए! .. तो 'आज' के इस माहौल में जब पहले दिन मैं अपना स्कूटर लेकर गया तो लोग भौंचक रह गए कि अब यह चिकना-चुपड़ा आदमी भी अखबार की नौकरी करेगा! तब तक वहां के लोग सायकिल से ही चलने की हैसियत रखते थे। विचित्र बात यह भी थी कि वहां का पूरा माहौल पाठक जी के खिलाफ था और लोग मुझे भी पाठक जी का ही आदमी समझ कर मेरे भी खिलाफ रहते थे। कुल मिलाकर 'आज' का माहौल मेरे रास्ते में पडऩे वाले उस दुर्गाकुण्ड के काई वाले सोये हुए जल जैसा था, जहां कभी मेरा मुण्डन हुआ था।
'आज' में मेरे पहुंचने के दौरान अखबार के मालिक शार्दूल विक्रम गुप्त के मन में अखबार को रामनाथ गोयनका के 'इंडियन एक्सप्रेस' जैसे माहौल में ढालने की ललक जाग चुकी थी और उन्होंने नये लोगों को बढ़ावा देने का प्रयास किया। दो-ढाई महीने में ही दफ्तर की सारी पुरानी टेबलें बदल दी गयीं। अखबार में काम करते हुए मैंने यह बिल्कुल नहीं सोचा कि मेरा एक्स्ट्रा टाइम लग रहा है। मेरे अंदर कहीं यह चुनौती जागृत होने लगी थी कि एक अखबार का माहौल क्यों नहीं किसी कार्पोरेट दफ्तर की तरह हो सकता है? फिर धीरे-धीरे चीजें बदलने लगीं थीं लेकिन मैं जितना तेज काम करता था बनारस उस तेजी के खिलाफ था। ...भाषा के स्तर पर भी मुझे संघर्ष करना पड़ रहा था। एक बार इंग्लैंड की क्रिकेट टीम के कप्तान इयान बाथम के लिए 'शख्सियत' शब्द का प्रयोग कर देने पर मेरी बड़ी लानत-मलामत हुई कि बनारस शिव प्रसाद सिंह सितारे हिंद का शहर है, यहां इस तरह की भाषा क्यों थोपी जा रही है? उन लोगों का दम्भ था कि वे महान इतिहास का निर्माण कर रहे हैं। इस बीच पालेकर एवार्ड लागू हो गया और मुझे स्थायी नहीं किया गया तो मैंने 'आज' छोड़ दिया। 16 जुलाई 1981 को दुबारा अखबार से जुड़ा तो सजा के बतौर मुझे ब्यूरो चीफ बनाकर इलाहाबाद भेज दिया गया।
इलाहाबाद और वहां का प्रेस क्लब
मार्च 1982 में मैं इलाहाबाद में ब्यूरो चीफ बन गया था। शार्दूल विक्रम जी का मुझ पर विश्वास था। 9 अगस्त 1984 को जब 'आज' का इलाहाबाद संस्करण निकला तो मुझे उसका संपादक बना दिया गया। शार्दूल विक्रम गुप्त ने मुझे यह सीखने का मौका दिया कि अखबार को एक उद्योग के रूप में किस तरह विकसित किया जाय। बी.एच.यू. में मास्टरी की बात मेरे दिमाग में थी जरूर लेकिन इसके लिए मुझे रिसर्च करना जरूरी था। पर इतना समय मेरे पास नहीं था। पैसे भी मुझे बी.एच.यू. के मास्टरों से ज्यादा मिलने लगे थे। मुझे लगने लगा था कि एक अखबार के माध्यम से भी लोगों की तकलीफें दूर की जा सकती हैं। ऐसे हजारों अनुभव मेरे पास हैं। मुझे यह भी लगा कि सिक्कों व पुरानी चीजों के लिए खुदाई से बेहतर है कि आज के माहौल को बेहतर बनाया जाय, आज की ही खुदाई की जाय। ... 28 साल हो गए हैं तब से वर्तमान की यह खुदाई करते और बहुत कुछ सार्थक इसमें से निकाल पाने में भी कामयाब रहा हूं, ऐसा मुझे अनुभव होता है
मैं बताता चलूं कि मेरा बचपन भी इलाहाबाद में ही गुजरा था। इलाहाबाद में जड़ता कम थी लेकिन उसका स्वरूप दूसरा था। वहां आभिजात्य का आतंक था। भाषा के स्तर पर एनआईपी (नार्दर्न इंडिया पत्रिका) जैसे अंग्रेजी अखबार का आभिजात्य था तो हाईकोर्ट के जजों और वकीलों का आभिजात्य था। नेहरू खानदान का भी अपना अलग आभिजात्य था! अजीब नास्टैल्जिक शहर था इलाहाबाद। दूसरी तरफ कुछ नई चीजें भी उभर रही थीं। तब मेरे पिताजी वहां जिला सूचना अधिकारी थे। वे अपने स्तर से जमे-जमाए लोगों से लोहा ले रहे थे। तब तक मुझे यह समझ में आ गया था कि सशक्तीकरण पैसे से नहीं जहनियत से आता है। मैंने इलाहाबाद न्यूज रिपोर्टर क्लब जो सोया था और वर्षों से जिसका चुनाव नहीं हुआ था और एक ही गुट का कब्जा रहता था, उसे बदला। उसके सेक्रे टरी के तौर पर नियम बनवाए। 75/- प्रेस कांफ्रेंस की फीस रखी गयी और तय किया गया कि कोई भी प्रेस कांफ्रेंस किसी के घर पर नहीं होगी। केवल प्रधानमंत्री या इस तरह के ही कुछ लोगों के लिए छूट थी। इसी का परिणाम था कि हमारे क्लब में अमिताभ बच्चन एमपी बनकर आए तो बहुगुणा जी भी आए। 87 तक जब तक मैं वहां था, यह नियम चलता रहा। हमने पत्रकारों के बारे में लोगों की यह छवि खत्म की कि उन्हें एक बोतल रम देकर कहीं भी बुलाया जा सकता है। यह मेरा पत्रकारों के सशक्तीकरण का ही प्रयास था जो आज भी जारी है।
मीडिया एक ताकत
दरअसल मीडिया की अपनी एक हस्ती है, एक ताकत है। थ्येन आन मन चौक (बीजिंग) पर जब आंदोलनकारी नौजवानों को भूनकर रख दिया गया था तो उससे पहले सारे मीडिया पर बंदिश लगा दी गयी थी। लेकिन चीनी शासक यह भूल गये थे कि फैक्स मशीन का आविष्कार हो चुका है। हांगकांग में खबर फैक्स से पहुंची और फिर पूरी दुनिया जान गयी तो चायना सरकार शर्म से झुक गयी थी। बड़े-बड़े राजनीतिज्ञों/सांसदों और अभिनेताओं तक को कटघरे में खड़ा करवाने का काम मीडिया ने ही किया है। जेसिका लाल व नीतीश कटारा ये दो ऐसे मामले हैं जिसमें न्याय मीडिया की ही बदौलत हो पाया। दूसरी तरफ अरुषि हत्याकांड या ऐसे दूसरे कुछ मामले भी हुए जिन्होंने मीडिया को शर्मसार भी किया, मीडिया फेल भी हुआ। इसकी वजह यह रही कि खबरों की भी पवित्रता होती है। सच शब्दों में ही लिखा जा सकता है। तर्क सत्य के खिलाफ होता है। बेचने की प्रवृत्ति और तर्क ने मीडिया को सवालों के घेरे में खड़ा किया है। लेकिन मीडिया स्वयं ही अपने दलदल से बाहर भी निकलता है। न्यूज ब्राडकास्टर्स ने एन.बी.ए. (न्यूज ब्राडकास्टर्स एसोसिएशन) के नाम से एक संस्था बनाई है। इस इंटरव्यू के छपने तक बहुत कुछ महत्वपूर्ण निर्णय भी सामने आ सकते हैं।
राजनीति, अपराध और मीडिया
जब मैं इलाहाबाद में रहता था तो सोचता था बल्कि चिंता करता था कि हमारा सांसद कोई दूसरा जवाहर लाल नेहरू नहीं हो रहा है! हमारी चिंता यह भी थी कि ठीक है अमिताभ बच्चन बहुत बड़े अभिनेता हैं और लोकप्रिय हैं लेकिन क्या ग्लैमर को राजनीति पर हावी होना चाहिए? बहुगुणा जी तपे तपाए राजनीतिज्ञ थे लेकिन अमिताभ बच्चन को एक लाख चौरासी हजार से ज्यादा वोटों से जीतने से नहीं रोका जा सका। ...आज उसी इलाहाबाद की राजनीति के प्रतीक पुरुष कौन हैं? आप कुछ भी उनके खिलाफ छाप लें लेकिन वे जेल से भी जीत जाएंगे! साथ ही यह भी बड़ा सच है कि अपराधी तत्वों के काले कारनामों को यदि कोई सामने ला रहा है तो वह है मीडिया। यदि मीडिया न हो तो आप रंगे सियारों को पहचानते कैसे? बेबसी के बावजूद हमारी लड़ाई कायम है! जब तक अपराध सिद्ध न हो जाय आप किसी को अपराधी नहीं कह सकते। इस प्रक्रिया में तो सालों साल लग जाते हैं। ...तो क्या हम तब तक प्रतीक्षा करते रहेंगे? ऐसे में हमें कुछ शब्दों को ईजाद करना पड़ता है, मसलन 'बाहुबली' उनका सहारा लेना पड़ता है और इन शब्दों से एक खास किस्म के लोग ही रेखांकित होते हैं। अब राहुल गांधी को तो कोई बाहुबली नहीं कहता है। ...तो यह लीगल बाइंडिंग है। 'अमर उजाला' में आने के बाद हमने तय किया कि राजनेताओं के फोटो कवर पेज पर नहीं छपेंगे। इसको लेकर शिकायतें की गयीं, लेकिन अखबार मालिक हमारे साथ थे। उन्होंने एक कान से सुना और दूसरे से निकाल दिया। ...मेरा अपना अनुभव है तथा 28 साल के संघर्ष का निष्कर्ष भी कि हिन्दी बेल्ट में एक बहुत बड़ी गड़बड़ी यह रही कि अखबार, अदालत और पाठशाला में सबसे कम शिक्षित लोग पहुंच पाए। ये वे लोग थे जो और कुछ नहीं कर सकते थे। जिसका परिणाम तरह-तरह की विसंगतियों के रूप में सामने आया।
साहित्य में रचे गए पाखंड
साहित्य के बिना कोई समाज वैसे ही है जैसे हवा और पानी के बिना जिन्दगी। लेकिन एक बड़ा पाखण्ड पूर्ण कार्य हुआ है साहित्य में। हिन्दी के बड़े अखबारों में जिन लोगों ने कब्जा किया वे यूनिवर्सिटी के प्राध्यापक साहित्यकार थे। उनके पास यूनिवर्सिटी का माध्यम और फंड था, अखबार मालिकों का फंड था। इस बल पर कुछ विचारधाराओं को समाप्त करने की राजनीति शुरू हो गई। समाज के लिए हवा-पानी के बजाय उसे दूसरों को नीचा दिखाने, चरित्र हनन के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा। शब्द जब सार्थकता के बजाय मारक साबित होने लगे, चरित्र-हत्या के लिए प्रयुक्त होने लगे तो यही होना था। साहित्य की आज जो स्थिति है उसके लिए जो इस क्षेत्र के स्वनामधन्य बड़े लोग हैं, जिम्मेदार हैं। 'माया' साहित्य से समाचार की पत्रिका बन गई। 'सारिका' का पतन क्यों और किन वजहों से हुआ, यह हम सभी जानते हैं। ...मैं खुद कोई साहित्यकार नहीं हूं लेकिन 'अमर उजाला' में साहित्य को स्थापित करने का प्रयास लगातार करता रहा हूं। यदि साहित्यिक पत्रकारिता की बात करें तो इस दिशा में पूरी पीढ़ी का अन्तराल आ गया है। इस गैप ने साहित्य को अखबारों से अलग कर दिया है। मुझे साहित्यकारों से अच्छी कहानियां नहीं मिल पातीं। वे चाहते हैं कि हम उनके चक्कर लगाएं, उनकी खुशामद करें। मैं महादेवी वर्मा जैसों तक की बात करता हूं जिन्होंने मुझे एक इंटरव्यू के लिए तीन-चार महीने चक्कर लगवा दिए! साहित्य की जो भी स्थिति है उसके लिए मैं साहित्यकारों को भी जिम्मेदार मानता हूं। जब वी.पी. सिंह ने उर्दू को दूसरी राजभाषा घोषित किया तो इलाहाबाद के एक होटल में पांच साहित्यकार जुटे जिनमें महादेवी वर्मा, जगदीश गुप्त, अमृत राय तथा दो और थे। मैंने उनसे इस मुद्दे पर एक-एक लेख की मांग की लेकिन जगदीश गुप्त और अमृत राय ने महीनों लटकाए रखने के बाद लिखकर कुछ नहीं दिया। महादेवी वर्मा ने इंटरव्यू देने में दो महीने लगा दिए! खीझकर मैंने उन लोगों से तब कह दिया था- आप लोग हिन्दी की खाते हैं या हिन्दी को खाते हैं? साहित्य आज भी मरा नहीं है। वह किसी की बपौती नहीं है। ब्लाग पर बड़ा अच्छा काम हो रहा है। अखबार फिर मजबूरी में साहित्य की ओर लौटेंगे ऐसा मैं मानता हूं।
तीन दशकों में पत्रकारिता को लगातार पुष्ट होते देखा है मैंने। कोई इस पर बाजार से तो कोई किसी समूह से तो कोई समाज से हमला बताता है पर सच्चाई यह है कि हमला कहीं से नहीं है। यह हिन्दुस्तान में ही संभव है कि वीर सिंघवी, स्वामीनाथन अंकल सेरिया अय्यर तथा अरुन्धती राय कश्मीर को आजाद करने की बात कर रहे हैं। देश को विभाजित करने की बात पत्रकारों द्वारा लिख दी जाती है और उसे भी हजम कर लिया जाता है तो इससे बढकर स्वतंत्रता और क्या हो सकती है। 28 सालों का मेरा पत्रकारिता का संघर्ष मुझे अमरत्व भले न प्रदान करे लेकिन मेरे प्रोफेशन के लिए जरूर अमरबेल का काम कर रहा है। हमने झंडा-बिल्ला लेकर लड़ाई नहीं लड़ी। लेकिन संस्थान के अन्दर हम लगातार जूझते रहे हैं। हमारा मानना है कि संस्थान बदलेगा, वह फलेगा-फूलेगा तो पत्रकारों की भी स्थिति में सुधार होगा। एक शेर याद आता है-
सितारों को शायद खबर ही नहीं
कहां दिन गुजारा कहां रात की।
(कमलेश भट्ट 'कमल' को दिए लंबे साक्षात्कार पर आधारित)












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