KhatuShyam: क्या है खाटू श्याम और श्रीकृष्ण का रिश्ता?

नई दिल्ली।राजस्थान के सीकर जिले में एक छोटा सा कस्बा है खाटू। यह बाबा खाटू श्याम का धाम है। खाटू श्याम दरअसल भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्त थे जिनका असली नाम बर्बरीक था। इन्हें शीश दानी के नाम से पूजा जाता है। बर्बरीक के त्याग से प्रसन्न् होकर भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें अपना नाम श्याम दिया था, जो खाटू श्याम के नाम से प्रसिद्ध हुए। खाटू धाम में फाल्गुन माह में खाटू श्याम का मेला आयोजित किया जाता है।

मेला बारह दिन चलता है

मेला बारह दिन चलता है

वैसे तो मेला फाल्गुन शुक्ल पड़वा से प्रारंभ होकर द्वादशी तक यानी बारह दिन चलता है, लेकिन मुख्य मेला अष्टमी से द्वादशी तक पांच दिन का होता है। जिनमें फाल्गुन शुक्ल एकादशी को खाटू श्याम का मुख्य उत्सव मनाया जाता है। मेले में देशभर के लाखों श्रद्धालु जुटते हैं और बाबा खाटू श्याम के साथ होली खेलकर अपने घर के लिए प्रस्थान करते हैं।

निशान यात्रा

निशान यात्रा

मेले में आए सभी लोग प्रतिदिन बाबा के दर्शन, पूजन के बाद हर दिन आयोजित होने वाली भजन संध्या में भाग लेते हैं। मेले में कई श्रद्धालु तो ऐसे होते हैं जो अपने पूरे दल के साथ पदयात्रा करते हुए खाटू धाम तक आते हैं। वे बाबा खाटू श्याम का पीला विशाल ध्वज और नारियल लेकर यात्रा निकालते हैं, जिसे निशान यात्रा कहा जाता है। निशान यात्रा में वे लोग शामिल होते हैं जो बाबा से कोई मनोकामना मांगते हैं और वह पूरी होती है।

कौन है खाटू श्याम

कौन है खाटू श्याम

खाटू श्याम का असली नाम बर्बरीक था। वे भीम के पोते थे। बर्बरीक महाशक्तिशाली योद्धा थे। महाभारत युद्ध के बाद बर्बरीक का शीश भगवान श्रीकृष्ण ने रूपवती नदी में प्रवाहित कर दिया था। कलयुग प्रारंभ होने के कई साल बाद बर्बरीक का सिर नदी में पाया गया, जिसे राजस्थान के सीकर जिले में दफनाया गया, तभी से इस स्थान का नाम खाटू पड़ा। काफी समय बीत जाने के बाद उस स्थान से जब गायें गुजरती थी तो उनके थन से दूध अपने आप बहने लगता था, जब स्थानीय ग्रामीणों ने उस जगह को खोदकर देखा तो उसमें एक सिर मिला।

फाल्गुन में लगता है 12 दिवसीय मेला

फाल्गुन में लगता है 12 दिवसीय मेला

लोगों ने वह सिर गांव के एक विद्वान ब्राह्मण को यह कहकर सौंप दिया कि वे अपने ज्ञान से पता करके बताएं कि यह सिर किसका है। इसी बीच उस स्थान के राजा रूपसिंह चौहान को स्वप्न में खाटू श्याम ने दर्शन दिए और जहां सिर मिला वहां एक मंदिर बनाने की बात कही। राजा ने तुरंत वहां एक मंदिर का निर्माण किया और जिस दिन खाटू श्याम की प्रतिमा स्थापित की गई वह दिन फाल्गुन शुक्ल एकादशी का था। तभी से यहां फाल्गुन में 12 दिवसीय मेला आयोजित किया जाता है।

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