काल भैरव जयंती 29 नवंबर को, शत्रुओं पर विजय और दुर्घटना से रक्षा के लिए करें काल भैरव की पूजा
नई दिल्ली। मार्गशीर्ष माह के कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि के दिन भगवान काल भैरव की जयंती मनाई जाती है। शिव के क्रोध से उत्पन्न् हुए भगवान काल भैरव की कृपा पाने का यह सबसे उत्तम दिन होता है। काल भैरव की पूजा से शत्रुओं पर विजय पाई जा सकती है और दुर्घटना से सर्वत्र रक्षा होती है। काल भैरव जयंती को भैरव अष्टमी या कालाष्टमी के नाम से भी जाना जाता है। भैरव अष्टमी का व्रत सप्तमी तिथि के दिन भी मनाया जा सकता है। धार्मिक मूलग्रंथ के अनुसार जिस दिन अष्टमी तिथि रात्रि 12 बजे के दौरान प्रबल होती है उस दिन काल भैरव अष्टमी का व्रत किया जाना चाहिए। इस लिहाज से यह अष्टमी 29 नवंबर 2018 गुरुवार को आ रही है।

भैरव अष्टमी व्रत की विधि
नारद पुराण के अनुसार भैरव अष्टमी के दिन भगवान काल भैरव और मां काली की पूजा का विशेष महत्व होता है। इस रात देवी के उपासकों को मां काली की विशेष पूजा संपन्न् करना चाहिए। भगवान काल भैरव का सवारी श्वान है, इसलिए इस दिन श्वान को भोजन करवाना चाहिए।

भैरव अष्टमी का प्रभाव
- भगवान भैरव को कलयुग का जागृत देव माना गया है। ये काशी के कोतवाल हैं। किसी भी प्रकार के हवन-पूजन आदि शुभ कार्यों से पहले भैरव की पूजा भी की जाती है ताकि उनके हवन, यज्ञ आदि की रक्षा हो सके।
- भैरव अष्टमी का व्रत बहुत फलदायी माना जाता है। इस दिन व्रत रखकर पूरे विधि-विधान से काल भैरव की पूजा करने से मनुष्य को संकटों से मुक्ति मिलती है। मृत्यु का भय दूर हो जाता है और दुर्घटनाओं और रोगों से मुक्ति मिलती है।
- काल भैरव भगवान शिव का ही एक रूप हैं इसलिए भैरव की पूजा से शिव भी प्रसन्न् होते हैं।
- भैरव अष्टमी की रात्रि में तेल के पांच दीये जलाकर भैरव चालीसा का पाठ करने से शत्रुओं पर विजय पाई जा सकती है।
- काल भैरव की पूजा से समस्त प्रकार की तंत्र बाधा का निवारण होता है। भूत-प्रेत आदि का भय नहीं रहता।













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