Geeta Jayanti 2020:'कर्मणये वाधिकारस्ते मां फलेषु कदाचन'...तनाव मुक्त जीवन के लिए जरूरी हैं गीता के ये उपदेश

Geeta Jayanti 2020: हर वर्ष मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को 'गीता जयंती' मनाई जाती है, पूरे विश्न में अकेला ऐसा ग्रंथ है, जिसकी जयंती मनाई जाती है। मालूम हो कि महाभारत के युद्ध के दौरान रण में अपनों को देखकर जब अर्जुन का मन घबराया तो उनके सारथी बने श्री कृष्ण ने उन्हें गीता का उपदेश दिया था, जिससे कि उनका मोह खत्म हो जाए इसलिए इस एकादशी को 'मोक्षदा एकदशी' भी कहा जाता है। इस बार ये विशेष पर्व 25 दिसंबर को आया है।

आइए एक नजर डालते हैं गीता के उपदेशों पर, जिन्हें जानना हर उस इंसान को जरूरी है, जो जीवन में तनावमुक्त होकर सफलता के पथ पर चलना जानता है...

'आत्मा ना तो मरती है और ना पैदा होती है'

'आत्मा ना तो मरती है और ना पैदा होती है'

  • आत्मा ना तो मरती है और ना पैदा होती है इसलिए आपको हमेशा आत्मा की पवित्रता पर ध्यान देना चाहिए।
  • गुजरे हुए कल और आने वाले कल की चिंता नहीं करनी चाहिए, क्योंकि जो होना है वही होगा।
  • जो होता है वो अच्छा ही होता है, इसलिए वर्तमान का आनंद लीजिए और चिंता मुक्त रहिए।
  • नाम, पद, प्रतिष्ठा, संप्रदाय, धर्म, स्त्री या पुरुष हम नहीं हैं और न यह शरीर हम हैं।
  • ये शरीर अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश से बना है और इसी में मिल जाएगा, आत्मभाव में रहना ही मुक्ति है।
'मान-अपमान के फेर में नहीं पड़ना चाहिए'

'मान-अपमान के फेर में नहीं पड़ना चाहिए'

  • परिवर्तन संसार का नियम है। यहां सब बदलता रहता है। इसलिए सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय, मान-अपमान के फेर में नहीं पड़ना चाहिए।
  • अपने क्रोध पर काबू रखें। क्रोध से भ्रम पैदा होता है और भ्रम से बुद्धि विचलित होती है। इससे स्मृति का नाश होता है और इस प्रकार व्यक्ति का पतन होने लगता है।
  • हमेशा याद रखिए क्रोध, कामवासना और भय ये हमारे शत्रु हैं।
  • अपने को भगवान के लिए अर्पित कर दो पूरी तरह से, हम दुःख, भय, चिन्ता, शोक और बंधन से मुक्त हो जाएंगे।
  • हमें अपने देखने के नजरिए को शुद्ध करना होगा क्योंकि नजरिए से ही नजर तय होती है।
'कर्मणये वाधिकारस्ते मां फलेषु कदाचन'

'कर्मणये वाधिकारस्ते मां फलेषु कदाचन'

  • कर्म कीजिए और फल की चिंता ना कीजिए, अपनी मेहनत और ईमानदारी पर भरोसा कीजिए।
  • अशांत मन को शांत करने के लिए अभ्यास पर ध्यान पर ध्यान दीजिए। असंतुलित मन विनाश की जन्म देती है।
  • हम जो भी कर्म करते हैं उसका फल हमें ही भोगना पड़ता है। इसलिए कर्म करने से पहले विचार कर लेना चाहिए।
  • कोई और काम पूर्णता से करने से कहीं अच्छा है कि हम अपना ही काम करें। भले वह अपूर्ण क्यों न हो।
  • सभी के प्रति समता का भाव, सभी कर्मों में कुशलता और दुःख रूपी संसार से वियोग का नाम योग है।
  • निंदा, छल, कपट, जलन ये सब मनुष्य को कमजोर करते हैं क्योंकि इनसब के बीच पड़कर इंसान केवल अपने लिए मुसीबत पैदा करता है।

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