Dhanteras 2020: जानिए धनतेरस की कथा और महत्व
नई दिल्ली। भारत के प्रमुख त्योहारों में सबसे विशिष्ट स्थान रखता है दीपावली पर्व। दीपों का यह पांच दिनी पर्व पूरे भारत को सजा- संवार देता है। इस त्योहार पर द्वार- द्वार चमक जाता है, घर- घर दमक जाता है और अपनों के मेल से हर दिल, हर रिश्ता संवर जाता है। दीवाली का त्योहार पांच दिनों का होता है और इसकी शुरुआत होती है धनतेरस से। धनतेरस को लेकर हमारे धार्मिक ग्रंथों में 2 कहानियां मिलती हैं- पहली कथा है आयुर्वेद के जनक भगवान धनवंतरि के प्राकट्य की। दूसरी कथा में देवी लक्ष्मी और भगवान विष्णु की नोंक- झोंक की मिठास है।

तो आज इन दोनों कथाओं का आनन्द लेते हैं-
धनतेरस की पहली कथा का सम्बंध समुद्र मंथन से है। पुराणों में उल्लेख मिलता है कि जब देवताओं और दानवों ने अमृत की प्राप्ति के लिए समुद्र मंथन किया, तब ब्रह्मांड को 18 अमूल्य निधियां मिलीं। इनमें से एक थे भगवान धन्वंतरि। धनतेरस के दिन ही भगवान धन्वंतरि हाथ में अमृत कलश लिए प्रकट हुए थे और संसार को आयुर्वेद का ज्ञान दिया था। इसके बाद उन्हें देवताओं का वैद्य बनाया गया था। धन्वंतरि जी के हाथ के अमृत कलश की याद में ही धनतेरस पर बर्तन खरीदने की परंपरा प्रारम्भ हुई।
भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी
दूसरी कथा भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी से जुड़ी है। इस कथा के अनुसार विष्णु जी एक बार अकेले किसी कार्य हेतु जा रहे थे। उनके मना करने के बाद भी देवी लक्ष्मी चुपके से उनके पीछे गईं। रास्ते में देवी एक किसान के खेत में रुककर सरसों के फूलों से श्रंगार करने लगीं और गन्ना चूसने लगीं। इतने में विष्णु जी आ गए और देवी से नाराज होकर उन्हें 12 वर्ष तक उसी किसान के घर पर रहने का दंड दिया। देवी लक्ष्मी के कारण वह किसान सम्पन्न हो गया। तेरहवें वर्ष जब विष्णु भगवान अपनी पत्नी को लेने आए, तब किसान ने उन्हें लौटाने से मना कर दिया। इस पर लक्ष्मी जी ने कहा कि कल तेरस है। कल तुम तांबे के कलश में रुपया भरकर, घी का दीपक जलाकर शाम के समय मेरी पूजा करना। इस पूजा के बाद में तुम्हारा घर छोड़कर साल भर तक नहीं जाऊंगी। हर साल तेरस को यह पूजा करते रहना। किसान ने माता की बताई विधि से पूजा की और अटूट संपत्ति के साथ सुखी जीवन व्यतीत किया। इस तरह कार्तिक मास की तेरस का नाम धनतेरस पड़ गया और बर्तन की पूजा करने की परंपरा स्थापित हुई।












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