Chhath Puja: त्रेता युग का सूर्य मंदिर 9.50 लाख साल पुराना, लाखों श्रद्धालु डूबते सूर्य को अर्घ्य देंगे, जानिए
लोक आस्था का महापर्व बिहार के अलावा अब वैश्विक बनता जा रहा है। कार्तिक मास के छठ के अलावा हिंदी नव वर्ष की शुरुआत के पांच दिनों बाद चैत्र मास का छठ मनाया जाता है। जानिए इस महापर्व से जुड़ी विशेष बातें--

Chhath Puja 2023 के मौके पर श्रद्धालु अस्ताचलगामी और उदयाचलगामी सूर्य को अर्घ्य देंगे। चार दिनों तक चलने वाले लोक आस्था के महापर्व छठ का बिहार में औरंगाबाद जिले में खास महत्व होता है। कार्तिक मास में पूरा जिला प्रशासन इस आयोजन को सफल बनाने में जुटता है। इसके अलावा चैत्र मास के छठ में भी जिला प्रशासन की अहम भूमिका होती है। औरंगाबाद जिले में देव सूर्य मंदिर छठ व्रतियों की श्रद्धा का विशेष केंद्र है। लोक आस्था और मंदिर परिसर में लगे शिलालेख के अनुसार इस मंदिर का संबंध त्रेता युग से है। जानिए चैत्र मास के छठ से जुड़ी कुछ रोचक बातें--

आस्था का चरम और पवित्रता की पराकाष्ठा
चार दिनों का महापर्व छठ इस साल 25 मार्च से शुरू हुआ। नहाय-खाय के साथ शुरू होने वाले छठ महापर्व के दौरान श्रद्धालुओं की आस्था का चरम और पवित्रता की पराकाष्ठा देखी जाती है। देव सूर्य मंदिर में जुटने वाले व्रत और श्रद्धालु चार दिनों के अनुष्ठान के दौरान अलग ही आध्यात्मिक जोन में होते हैं।

Chhath में दूसरे दिन खरना पूजा
नदी-तालाब और ऐसे ही अन्य जलाशयों में स्नान के बाद शुरू होने वाला चार दिवसीय महापर्व के पहले दिन शनिवार को स्नान के बाद व्रतियों ने लौकी / कद्दू की सब्जी और चावल पकाने के बाद अनुष्ठान की शुरुआत की। कुछ इलाकों में इसे कद्दू-भात का आयोजन भी कहा जाता है। प्रसाद स्वरूप भोजन के साथ शुरू होने वाले इस पर्व के दूसरे दिन खरना पूजा की जाती है।

36 घंटे का निर्जला उपवास
नहाय-खाय के बाद खरना पूजा करने वाले व्रती करीब 36 घंटों का निर्जला व्रत रखते हैं। इस साल रविवार यानी 26 मार्च को खरना पूजा है। इस के मौके पर व्रती सूर्य नारायण की पूजा करने के बाद पहले खुद प्रसाद ग्रहण करते हैं। व्रती इस प्रसाद के बाद पानी ग्रहण करते हैं, इसके बाद 36 घंटे का निर्जला उपवास होता है।

डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा
छठ व्रती खरना का प्रसाद श्रद्धालुओं के बीच वितरण करते हैं। सूर्यास्त के बाद गाय के दूध और गुड़ के मिश्रण से बनने वाले खीर के इस प्रसाद को ग्रहण करने के अगले दिन अस्ताचलगामी यानी डूबते सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा है। जलाशयों में खड़े होकर छठ व्रती सूर्य नारायण का आह्वान और उनकी उपासना करते हैं। इसके बाद डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। अगले दिन उगते सूर्य को अर्घ्य के साथ व्रत और छठ महापर्व का अनुष्ठान पूरा होता है।

इस मंदिर में औरंगजेब को भी मिली मात
यूं तो छठ महापर्व अब भारत की सरहदों से परे वैश्विक बन चुका है, लेकिन औरंगाबाद के देव सूर्य मंदिर से खास कथा और आस्था जुड़ी है। मुगलशासक औरंगजेब के बारे में कहा जाता है कि देव सूर्य मंदिर की महिमा से अनजान मदांध शासक एक समय इस मंदिर को भी तोड़ने आया था। हालांकि, उसने चेतावनी और चुनौती देकर एक रात के लिए मंदिर छोड़ा, जो आज भी लोगों की आस्था का केंद्र है।

रात में बदल गई दिशा, पश्चिम दिशा में बने द्वार
देव सूर्य मंदिर और औरंगजेब के बारे में कहा जाता है कि उसने कहा था कि अगर रातों रात मंदिर का प्रवेश द्वार पूर्व से पश्चिम दिशा की तरफ हो जाएगा तो वह इस मंदिर को नहीं तोड़ेगा। ऐसा ही हुआ और आज भी इस मंदिर में श्रद्धालु पश्चिम दिशा में बने द्वार से प्रवेश करते हैं। लोक श्रुति के अनुसार इस मंदिर का निर्माण स्वयं भगवान विश्वकर्मा ने किया है।

देव सूर्य मंदिर 9 लाख 49 हजार 125 साल पुराना
करीब 100 फीट ऊंचे इस मंदिर का निर्माण डेढ़ लाख साल पहले होने की बात कही जाती है। काले और भूरे पत्थरों से मिलकर बने इस मंदिर के निर्माण के बारे में परिसर के शिलालेख के अनुसार त्रेता युग में शिलान्यास हुआ। इस आधार पर 2023 में 9 लाख 49 हजार 125 साल पूरे हो चुके हैं। मंदिर की तीन प्रतिमाओं को सूर्यनारायण के तीन रूप (अवस्था) के रूप में पूजा जाता है। पहली प्रतिमा उदयाचल सूर्य यानी सुबह के समय, दूसरी प्रतिमा दोपहर (मध्याचल) और तीसरी अस्ताचल का प्रमाण है। पौराणिक कथाओं में तीनों स्वरूपों को ब्रह्मा विष्णु और महेश भी माना गया है।

त्रिकोण जलाशय में स्नान की मान्यता
इसी मंदिर के पास सूर्यकुंड तालाब है। मान्यता है कि इस मंदिर में स्नान के बाद कुष्ठ रोग से मुक्ति मिलती है। सूर्यकुंड में स्नान के लिए इस साल लाखों व्रतियों और श्रद्धालुओं के उमड़ने की उम्मीद है। देवकुंड के पास ही एक त्रिभुजाकार तालाब है। आस्था और मान्यता के मुताबिक संतान की मन्नत के साथ आने वाले दंपती इस त्रिकोण जलाशय में स्नान करते हैं और परमात्मा के आशीर्वाद से उनकी गोद भी भरती है। इस जलाशय का नाम पाताल गंगा है।

आस्था के महापर्व में लाखों श्रद्धालुओं का आगमन
जिला प्रशासन ने तालाबों की सफाई कराई है। बैरिकेडिंग कर श्रद्धालुओं को डूबने से बचाने का इंतजाम किया गया है। इस मौके पर पुलिस भी मुस्तैद है। दूसरे शहरों से आने वाले श्रद्धालुओं के ठहरने का इंतजाम भी किया गया है। आसपास के खेतों में लगी फसल के समय लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ को कंट्रोल करना चुनौतीपूर्ण होता है, लेकिन हर साल की तरह इस बार भी श्रद्धालुओं के स्वागत के लिए देव सूर्य मंदिर समेत पूरा जिला प्रशासन तैयार है।
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