Yezidi Community: बंदूक के बाद अब येजिदी समुदाय पर बाइबिल से हमला
लगभग एक दशक पहले ईराक में यजीदी लोगों पर इस्लामिक स्टेट के अत्याचारों ने पूरी दुनिया को सकते में डाल दिया था।ISIS के खूनी शिकंजे से तो वे बड़ी मुश्किल से बचे,लेकिन अब मदद के नाम पर मिशनरी उनके धर्मांतरण का कुचक्र रच रहे।

ईराक में आतंकी संगठन आईएसआईएस द्वारा जब काफिरों का क़त्ल किया जाने लगा था तो अचानक से ही दुनिया भर के सामने एक ऐसा धर्म सामने आया था, जो अब्राह्मिक मान्यताओं से पृथक है और उसकी धार्मिक मान्यताएं हिन्दुओं से मिलती जुलती हैं। उत्तर-पश्चिमी इराक़, उत्तर-पश्चिमी सीरिया और दक्षिण-पूर्वी तुर्की में छोटे-छोटे समूहों में यजीदी समुदाय की उपस्थिति पाई जाती है। यह समुदाय अपनी पृथक धार्मिक मान्यताओं के कारण लगातार अत्याचारों का शिकार होता रहा था और अभी तक हो रहा है परन्तु धार्मिक आधार पर इस समुदाय के संहार की कहानी पूरे विश्व के सम्मुख तब आई जब वर्ष 2014 में इस्लामिक स्टेट के लड़ाकों ने उन पर हमला किया।
सिंजर की पहाड़ियों पर रहनेवाले यजीदी समुदाय के लोगों पर जब इस्लामिक स्टेट का हमला हुआ तो बहुत सारे लोग वहां से भाग गये। जो नहीं भाग पाये ऐसे पुरुषों की हत्या कर दी गयी। महिलाओं और लड़कियों को बंधक बना लिया गया। इन्हीं महिलाओं और कम उम्र की लड़कियों को इस्लामिक स्टेट के लड़ाकों द्वारा सेक्स स्लेव बनाकर रखा गया। खरीदा और बेचा गया। ऐसे समाचार जब विश्वभर में लोगों को पता चला तो लोग स्तब्ध रह गये।
असल में यदीजी लोगों के धार्मिक विश्वास के अनुसार उनके भगवान यजदान के सात अवतार हैं। जिनमें एक मयूर देवता हैं जिन्हें 'मलक ताउस' कहा जाता है। वहीं सनातन धर्म को मानने वाले यह जानते हैं कि हिन्दुओं में भी मयूर को पवित्र माना जाता है। भगवान श्रीकृष्ण और दक्षिण भारत के प्रसिद्ध देवता मुरुगन अर्थात महादेव पुत्र कार्तिकेय के साथ मयूर को जोड़ा जाता है।
इतना ही नहीं हिन्दुओं की तरह यजीदी भी पुनर्जन्म एवं मोक्ष में विश्वास करते हैं। उनका मानना है कि आत्मा एक शरीर से दूसरे शरीर में यात्रा करती है, और उसके उपरान्त ही मोक्ष प्राप्त होता है। मोक्ष को यजीदियों में सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। धर्म से निकाले जाने को वह सबसे दुर्भाग्यपूर्ण मानते हैं। जल एवं अग्नि को पवित्र मानते हैं। हिन्दुओं की भांति हाथ जोड़कर वह पूजा आराधना करते हैं। आरती की थाल तैयार करते हैं। अग्नि एवं जल का अपमान नहीं करते हैं। यजीदी इस बात को भी मानते हैं कि कोई भी धर्म बदलकर यजीदी नहीं बन सकता अर्थात जन्म से ही कोई व्यक्ति यजीदी हो सकता है।
वह प्रात: एवं सांयकाल में सूर्य की ओर मुख करके नमस्कार एवं प्रार्थना करते हैं। जैसे हिन्दुओं में नाग की पूजा की जाती है, वैसे ही यजीदियों के मंदिर लालिश के बाहर प्रवेशद्वार पर नाग का चिह्न है। जबकि अब्राह्मिक ईसाई पंथ में सर्प को आदम और हव्वा को स्वर्ग से बाहर निकालने का दोषी माना जाता है।
यजीदियों के उक्त धार्मिक विचार ही अब्राह्मिक मतों से एकदम अलग प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त हैं। यही कारण है कि यजीदी समुदाय पहले इस्लाम के कट्टरपंथी संगठन आईएसआईएस के निशाने पर रहा, जिसमें लगभग 10,000 यजीदी पुरुषों को मार डाला गया और हजारों लड़कियों को सेक्स स्लेव बनाने के लिए अपहरण कर लिया गया। अभी तक उन लड़कियों को खोजा जा रहा है और उनकी कहानियां सोशल मीडिया प्लेटफोर्म पर साझा की जा रही हैं। दुर्भाग्य यह है कि अभी भी दो हजार से अधिक यजीदी लड़कियां गायब हैं। हिंसा की अति तो तब हो गयी जब इस्लामिक स्टेट के लड़ाकों द्वारा मोसुल में 19 लड़कियों को इसलिए जिन्दा जला दिया गया था क्योंकि उन्होंने सेक्स स्लेव बनने से मना कर दिया था।
धार्मिक आधार पर अत्याचार झेल रहे इस समुदाय ने हार न मानते हुए अपनी लड़ाई लड़ी और अब अपने पैर पर दोबारा खड़े हो रहे हैं। जब उन पर इस्लामिक स्टेट का हमला हुआ था तब यूरोप और अमेरिका ने उनकी मदद की, इसमें कोई संदेह नहीं। लेकिन ऐसा लगता है कि चर्च संगठन अब उस मदद की कीमत वसूलने में लग गये हैं। बंदूक के हमले से बाहर निकले यजीदियों पर अब बाइबिल का हमला हुआ है। फर्स्ट पोस्ट में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार यजीदी समुदाय अब मिशनरियों के निशाने पर है, जो अपने उसी हथियार का प्रयोग उन पर कर रहे हैं, जो वह अधिकांश आपदाग्रस्त क्षेत्रों में करते हैं। अर्थात, मानवता के नाम पर आपदा प्रभावित समुदाय की धार्मिक पहचान पर प्रहार करना।
मिडिल ईस्ट से आनेवाली एक रिपोर्ट के अनुसार सिंजर क्षेत्र में इस्लामिक स्टेट के जबरन धर्मांतरण, हत्याओं एवं शारीरिक गुलामी के अत्याचार झेल चुके यजीदी समुदाय के सामने ईसाई मिशनरी पढ़ाई के माध्यम से उन्हें उनके धार्मिक विश्वासों से दूर करके चर्च की ओर आकर्षित कर रहे हैं। जैसा कि सीएफएंड्रूज़ कई वर्षों पूर्व यह कह चुके थे कि अंग्रेजी शिक्षा का अर्थ ईसाई शिक्षा ही होता है। संसार भर में मिशनरियों ने यह प्रयोग सफलतापूर्वक किया है और अब सिंजर में भी यही प्रयोग कर रहा है।
अमेरिका से संचालित होनेवाली संस्था 'द रेस्टोरेशन एक्ट' जिसने अभी हाल ही में एक स्थानीय गैर सरकारी संगठन के साथ मिलकर एक साल के लिए शिक्षा परियोजना का क्रियान्वयन किया है, उस पर कई यजीदियों ने यह आरोप लगाया है कि वह सिंजर में और यजीदी शिविरों में सक्रिय रूप से ईसाई मत का प्रचार कर रहे हैं। एक स्थानीय कार्यकर्ता ने आरोप लगाया कि "वो चालाक रणनीति का प्रयोग करते हैं। अंग्रेजी में शिक्षा का प्रस्ताव देते हैं। सिलाई सिखाने का प्रस्ताव देते हैं और वह 800 से 2000 डॉलर तक का अनुदान भी देते हैं और फिर वह धर्मांतरण के उद्देश्य से "गॉड" की चर्चा करने लगते हैं।"
एक यजीदी सर्वाइवर सारा ने बताया कि जो ईसाई शिविरों में अंग्रेजी की कक्षा लेते हैं, वह उन्हें पढाई के बीच दो घंटो के लिए चर्च ले जाते हैं। सारा ने कहा कि वह लोग छोटे समूहों में जाते हैं। यजीदी धर्म गुरुओं ने इसे एक और नरसंहार की संज्ञा देते हुए कहा है कि यह आईएस जैसा नहीं बल्कि उससे कहीं बढ़कर है। "जो लोग आपका धर्मांतरण बन्दूक की नोक पर करते हैं और जो आपकी कठिन परिस्थितियों का फायदा उठाकर आप पर जबरन धर्मांतरण का दबाव डालते हैं, उन दोनों में कोई अंतर नहीं है।"
हालांकि इन संगठनों का कहना है कि यह सब झूठ है, परन्तु इन्स्टाग्राम पर पिछले दिनों एक क्लिप वायरल हुई थी जिसमें ईसाई मिशनरी एक यजीदी मंदिर के टूटने की प्रार्थना कर रहे हैं, जिससे कि शैतान के शाप की ताकत टूटे। यही शैतान की अवधारणा है जो गैर अब्राह्मिक मतों को पहले बन्दूक और बाद में बाइबिल का शिकार बनाती है। इसका शिकार हर वह धार्मिक मत है जो अब्राह्मिक मतों की धार्मिक अवधारणाओं में फिट नहीं बैठते हैं।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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