Yamuna: यमुना जिए की लड़ाई लड़ते-लड़ते असमय चले गए मनोज मिश्र
4 जून को जब दिल्ली में कुछ सामाजिक संस्थाएं गोविन्दाचार्य के नेतृत्व में यमुना के किनारे मानव श्रृंखला बनाकर उसे बचाने का संकल्प ले रही थीं, उसी दिन दिल्ली से दूर 'यमुना जिये' के संयोजक मनोज मिश्र ने प्राण त्याग दिये।

Yamuna: दिल्ली में यमुना नदी को फिर से जीवन दिलाने का संघर्ष मनोज मिश्र के जीवन का अंतिम लक्ष्य बन गया था। अब भारतीय वन सेवा के पूर्व अधिकारी मनोज मिश्र हमारे बीच नहीं रहे। कोविड संक्रमण के बाद होने वाली जटिलताओं के चलते वे बीमार चल रहे थे। रविवार 04 जून को भोपाल में उन्होंने अंतिम सांस ली। वो 68 वर्ष के थे और 10 अप्रैल से उनके कोविड संक्रमण का ईलाज चल रहा था।
मनोज मिश्र का जन्म उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में हुआ। उन्होंने अपनी शिक्षा उत्तराखंड के पंतनगर विश्वविद्यालय और फिर प्रयाग से पूरी की। वे मध्य प्रदेश कैडर के अधिकारी थे। 1979 में भारतीय वन सेवा का हिस्सा बने। 2001 में उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृति ले ली और 2007 से वे यमुना की साफ सफाई के अभियान के साथ पूर्णकालिक कार्यकर्ता की तरह जुड़ गए। उन्होंने अपने अभियान को नाम दिया था, यमुना जिए। यमुना को जिलाने की लंबी लड़ाई लड़ते-लड़ते वे खुद चले गए।
मनोज मिश्र ने यमुना नदी के लिए एक साक्षात्कार में कहा था कि दिल्ली में तीन-तीन एक्शन प्लान यमुना के लिए लाये गए लेकिन इसका कुछ फायदा नहीं हुआ। यमुना की स्थिति बद से बदतर होती चली गई। उन्होंने अपने कथन में यह भी जोड़ा कि कोविड काल में जब लॉकडाउन लगा, तब अप्रैल 2020 में यमुना नदी ने अपने आप को स्वस्थ कर लिया था। मतलब जो काम तीन तीन एक्शन प्लान ने नहीं किया। वह काम कोविड ने कर दिया था। यह इसलिए संभव हुआ क्योंकि उस दौरान यमुना में उद्योगों का कचरा आना बंद हो गया था।
तीन साल बाद जब ऐसा लग रहा है कि देश कोविड के दुष्चक्र से बाहर आ गया है, यह कैसी विडम्बना है कि कोविड ने मनोज मिश्रा को हमसे छीन लिया। इसका मतलब कोविड कहीं गया नहीं है। वह हमारे बीच है। मनोज मिश्र के निधन पर दिल्ली के राज्यपाल वीके सक्सेना ने निधन पर ट्वीट किया- ''मनोज मिश्र के असामयिक निधन से गहरा दुख पहुंचा है। मैं स्तब्ध हूं। यमुना के बेटे के रूप में वे उसके पुनरूद्धार के लिए लगातार प्रयास कर रहे थे। वे पर्यावरण के एक योद्धा थे।''
प्लान बनते रहे यमुना की हालत बिगड़ती रही
यमुना को लेकर तीन एक्शन प्लान बने। 1994 में पहला एक्शन प्लान आया, 2002 में दूसरा, 2012 में तीसरा। तीनों एक्शन प्लान का एक ही उद्देश्य था, यमुना की सफाई। इसमें अभी तक विशेष सफलता हासिल नहीं हुई है।
यमुना पर तैयार पहले एक्शन प्लान का साल वही था, जब सर्वोच्च न्यायालय यमुना प्रदूषण पर स्वतः संज्ञान लेकर सुनवाई करता था। सर्वोच्च न्यायालय से आने वाली टिप्पणियां पर्यावरण प्रेमियों में कोई विशेष उत्साह नहीं जगा पाती थीे। फिर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) वर्ष 2010 में बन गया, जो खासतौर पर पर्यावरणीय मामलों की सुनवाई के लिए ही बना था। यह मनोज मिश्र का समय था। जब वे पर्यावरण और यमुना के मुद्दे को लेकर दिल्ली में सक्रिय थे। एनजीटी दिल्ली के अंदर उनका दूसरा घर ही बन गया था, जहां वे अक्सर दिखते थे। जैसे बिहार की कोसी नदी से जुड़ी किसी भी जानकारी के लिए दिनेश मिश्र के पास लोग भागे चले जाते हैं, यमुना से जुड़ी जानकारी के लिए दिल्ली वालों के पास मनोज मिश्र थे।
दिल्ली की यमुना के डूब क्षेत्र और उनसे जुड़े जलाशयों पर उनका गहरा अध्ययन था। 2011 नवंबर में यमुना डूब क्षेत्र की उन्होंने एक यात्रा की और यह देखकर वे हैरान हुए कि यमुना के बहाव का क्षेत्र पूरी तरह कूड़े-कचरे और निर्माण मलबों से पटा पड़ा है। नदी में पड़ा मलबा यमुना की अविरल बहते जल की धारा को बाधित कर रहा था। नदी की यह स्थिति देखकर ही उन्होंने अपना 'जिए यमुना' अभियान शुरू किया। यमुना प्रदूषण के खिलाफ उनका संघर्ष लंबा चला। उन्होंने यमुना को पुनर्जीवित करने के लिए कई अदालती लड़ाइयां भी लड़ीं। न्यायालय से कई आदेश लेकर आए।
यमुना नदी के पक्ष में आए किसी निर्णय से पर्यावरण प्रेमियों का खुश होना स्वाभाविक था लेकिन यह खुशी अधिक दिनों तक टिकती नहीं थी। कुछ ही दिनों में यमुना नदी की बदहाली और वहां फैला प्रदूषण यथास्थिति को पा लेता, और यह सब देखकर फिर निराशा से कैसे बचा जा सकता था? नदी के लिए काम कर रहे कार्यकर्ताओं के मन यह सवाल आता ही है कि नदियों को सनातनी मां कहते हैं लेकिन उसकी सफाई, उसकी स्वच्छता, उसका अविरल बहना क्या किसी की चिन्ता में शामिल नहीं है। जिन घरों से गंदे पानी का नाला निकल कर यमुनाजी में मिल रहा है, वे सब भी सनातनी परिवार ही हैं। यदि हिन्दू समाज अपनी नदियों और पर्यावरण को लेकर तनिक भी जागरूक होता तो नदी की लड़ाई लड़ने वाले इस तरह अकेले क्यों पड़ जाते?
2016 की एक घटना की मीडिया में खूब चर्चा हुई थी। जब मनोज मिश्र ने श्री श्री रविशंकर के वर्ल्ड कल्चर फेस्टिवल के लिए आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन द्वारा बाढ़ के मैदानों को हुए नुकसान पर एनजीटी के समक्ष एक याचिका दायर की थी। ट्रिब्यूनल ने तब श्रीश्री रविशंकर के फाउंडेशन पर 5 करोड़ रुपये की पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति राशि तय की थी। इन पैसों का इस्तेमाल यमुना डूब क्षेत्र को बेहतर करने के लिए किया जाना था।
यमुना की स्वच्छता के सिपाही
केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा सफाई मंत्री रह चुकी उमा भारती मानती थीं कि यमुना की सफाई का काम, गंगा शुद्धिकरण का ही हिस्सा है। वे मानती थीं कि यमुना को साफ किए बिना गंगा सफाई का अभियान सफल नहीं हो सकता। इसलिए उन्होंने सफाई के उद्देश्य से गंगा मिशन की जो योजना बनाई थी, उस अभियान में यमुना को भी शामिल किया था।
आज यमुना संसद कर रहे राजनीतिक एवं सामाजिक विचारक गोविंदाचार्य 2021 में यमुना दर्शन यात्रा पर निकले थे। इस यात्रा के दौरान उन्होंने यमुना नदी के आस-पास प्रकृति आधारित विकास माॅडल पर रचनात्मक कार्य कर रहे विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े लोगों से संवाद किया, साथ ही उन विचारों को संकलित भी किया गया। गोविंदाचार्य के अनुसार- ''प्रकृति केंद्रित विकास के मॉडल वाले स्थान नवतीर्थ हैं। इसके साथ जो लोग प्रकृति केंद्रित विकास माॅडल पर कार्य कर रहे हैं, ऐसे लोग नव देवता हैं। प्रकृति केंद्रित विकास ही विकास का सही माॅडल है।''
भारतीय जनता पार्टी के नेता कपिल मिश्रा के संबंध में यह कम लोग जानते हैं कि उनका सामाजिक जीवन एक पर्यावरण कार्यकर्ता रूप में ही प्रारंभ हुआ था। राजेन्द्र सिंह के साथ मिलकर लंबे समय तक यमुना की स्वच्छता और उसकी जमीन पर हुए अवैध निर्माण के खिलाफ कपिल ने अभियान चलाया। कपिल के प्रयास से सोनिया विहार की यमुना आरती दिल्ली भर में चर्चित हुई।
इनके अलावा वृन्दावन के कथावाचक राजेन्द्र दास भी अपने स्तर पर दिल्ली में यमुना सफाई अभियान से जुड़े हैं। वो गोविन्दाचार्य के साथ मिलकर इस दिशा में कुछ कार्यक्रम आयोजित कर चुके हैं जिसमें सबसे बड़ा आयोजन तालकटोरा स्टेडियम में हुआ था। राजेन्द्र दास मानते हैं कि दिल्ली में यमुना साफ होंगी तभी मथुरा वृन्दावन में यमुना साफ होगीं।
5 योजनाओं वाला एक एक्शन प्लान
नदियों के साथ सिर्फ एक्शन प्लान की बात हर बार हुई। प्लान के साथ एक्शन देखने का अवसर देश को नहीं मिला है। अब दिल्ली की केजरीवाल सरकार 2025 तक साफ सुथरी यमुना दिल्ली वालों को देने का वादा कर रही है। वैसे ना तो ऐसे वादे दिल्ली वालों के लिए नए हैं और ना ही दावे। इस बार भी सरकार के पास 5 योजनाओं वाला एक एक्शन प्लान है और अब आगे दो साल का वक्त है।
इसमें पहली योजना है, अलग-अलग जोन में नालों की सफाई के लिए फ्लोटिंग बूम लगाए जाएंगे, ताकि नदी में बहाए गए प्लास्टिक को एक जगह इकट्ठा करके निकाला जा सके। दूसरी योजना है कि यमुना में मिलने वाले नालों के जोन में बांध बनाए जाएंगे। जिससे नालों में बहाए जाने वाले पानी की गंदगी नीचे बैठ जाए और बांध के ऊपर से साफ पानी ओवर फ्लो होकर आगे बढ़ जाए। दिल्ली सरकार की तीसरी योजना जोन वाइज एरिएशन डिवाइस लगाने की है। इस डिवाइस से पानी में ऑक्सीजन घुलेगा और पानी को और साफ कर देगा। इस तरह यह पानी प्राकृतिक तरीके से साफ होते हुए यमुना तक पहुंचेगा। चौथी योजना अलग-अलग जोन में फ्लोटिंग वेटलैंड लगाए जाने की है, जो पानी में घुली गंदगी को सोख लेंगे। पांचवीं योजना ड्रेन जोन में केमिकल डोजिंग की है। केमिकल डोजिंग के जरिए गंदगी वाले पानी में फॉस्फेट कम होगा और यमुना तक साफ पानी पहुंचेगा।
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जब यमुना को लेकर हर तरफ से निराशा भरी सूचनाएं ही आ रहीं हैं ऐसे में यदि दिल्ली सरकार ने 2025 तक यमुना की सफाई की दिशा में ईमानदारी से काम किया तो यही मनोज मिश्र को दिल्ली वालों की तरफ से सच्ची श्रद्धांजली होगी।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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