Wrestlers Protest: जितना अनसुना किया उतनी मुखर हो गयी महिला पहलवानों की आवाज
पहलवानों की मांग को सरकार जितना अनसुना कर रही है, वह सत्ता के समक्ष उतनी ही बड़ी चुनौती बन कर खड़ी हो रही है। महिला पहलवानों की आवाज अब दुनिया भर में गूंज रही है।

रविवार को जंतर-मंतर से पुलिस बल के सहारे महिला पहलवानों को हटा दिया गया। पुलिसिया कार्रवाई के बाद सरकार और प्रशासन मान बैठे थे कि अब पहलवानों का आंदोलन समाप्त हो गया और पहलवान अब अपने घर वापस लौट जायेंगे। लेकिन शासन-प्रशासन की बेरुखी और उत्पीड़न से निराश पहलवानों ने हरिद्वार जाकर अपने मेडल को गंगा मे प्रवाहित करने का ऐलान कर दिया। हालांकि कुछ लोगों के हस्तक्षेप के बाद पहलवान पांच दिनों के लिए मान गए हैं। लेकिन पांच दिन बाद फिर से यही स्थिति पैदा होगी। पहलवानों का कहना है कि सत्ता की नजर में उनकी बात और मेडल की कोई कीमत नहीं है, तो उसे रखने का कोई अर्थ नहीं है।
आश्चर्य की बात तो यह है कि लगभग महीने भर से जंतर मंतर पर पहलवानों का आंदोलन चल रहा था लेकिन केंद्र की मौजूदा सरकार, खेल मंत्रालय और भारतीय कुश्ती संघ निष्क्रिय बन तमाशा देख रहा है। ऊपर से आरोपी भाजपा सांसद ब्रजभूषण शरण सिंह धरना देने वाले पहलवानों की खिल्ली उड़ाने से बाज नहीं आ रहे हैं। इस बीच महिला पहलवानों के समर्थन में अंतरराष्ट्रीय कुश्ती संघ ने बयान देकर मामले को एक बार फिर बहस की मुख्यधारा में ला दिया है।
अंतरराष्ट्रीय कुश्ती संघ के बयान ने न सिर्फ महिला पहलवानों की मांगों को जायज ठहराया है बल्कि भारतीय शासन पर भी सवालिया निशान लगाया है। संघ ने पहलवानों की सुरक्षा की चिंता और उनके द्वारा लगाए गए आरोपों की निष्पक्ष जांच करने की मांग भी की है। संघ ने कहा है कि यदि भारत सरकार किसी संतोषजनक निष्कर्ष पर नहीं पहुंचती है तो भारतीय कुश्ती संघ की अंतरराष्ट्रीय कुश्ती संघ से संबद्धता समाप्त कर दी जायेगी।
अंतरराष्ट्रीय कुश्ती संघ की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि कई महीनों से यूनाइटेड वर्ल्ड रेस्लिंग (यूडब्ल्यूडब्ल्यू) भारत की इन बेहद चिंताजनक परिस्थितियों पर नजर रख रहा है जिसमें भारतीय कुश्ती संघ के अध्यक्ष पर महिला पहलवानों द्वारा लगाए गए यौन शोषण के आरोपों के खिलाफ पहलवान आंदोलन कर रहे हैं।
यूडब्ल्यूडब्ल्यू का कहना है कि कुछ दिनों पहले की घटनाएं और ज्यादा चिंता पैदा करने वाली हैं जब विरोध-प्रदर्शन को आयोजित किए जाने पर पहलवानों को कुछ देर के लिए हिरासत में ले लिया गया। और एक महीना से ज्यादा जिस जगह पर वो धरना-प्रदर्शन कर रहे थे प्रशासन ने उसे जबरन खाली करा लिया है। संघ ने पहलवानों की गिरफ्तारी और उनके साथ किए गए व्यवहार की कड़े शब्दों में निंदा की है। इसके साथ ही उसने जांच के नतीजे न आने पर गहरी चिंता जाहिर भी की है। वैश्विक संघ ने कहा है कि वह संबंधित अधिकारियों से आरोपों की विस्तृत और निष्पक्ष जांच की अपील करता है।
यही नहीं अंतरराष्ट्रीय कुश्ती संघ जल्द ही पहलवानों की स्थिति और सुरक्षा को जानने के लिए पहलवानों के साथ एक बैठक करेगा और उनकी चिंताओं को हल करने और उनके प्रति अपने समर्थन को फिर से दोहराने के लिए एक प्रस्ताव भी पारित करेगा।
आखिर में यूडब्ल्यूडब्ल्यू का कहना है कि वह आईओए से अगली चुनी हुई जनरल एसेंबली और भारतीय कुश्ती संघ (डब्ल्यूएफआई) की तदर्थ कमेटी के बारे में सूचना चाहता है। यदि भारतीय कुश्ती संघ के चुनाव आदि में कोई गड़बड़ी दिखती है तो अंतरराष्ट्रीय कुश्ती संघ इससे अपनी संबद्धता समाप्त कर लेगा।
फिलहाल, देश और विदेश की तमाम खेल प्रतियोगिताओं में पदक जीतने वाली विनेश फोगाट, साक्षी मलिक और बजरंग पूनिया पिछले 23 अप्रैल से दिल्ली में धरना पर बैठे थे। लेकिन सरकार के कान में जूं तक नहीं रेंगी। पहलवानों के समर्थन में किसानों और खाप पंचायतों के उतरने और नई संसद भवन के उद्घाटन के दिन महिला महापंचायत करने के ऐलान ने सरकार की चिंता को बढ़ा दिया था।
लोकतंत्र में हर किसी को अपनी बात कहने और विरोध-प्रदर्शन करने की आजादी है। पिछले एक महीने से जंतर-मंतर पर पहलवानों का धरना-प्रदर्शन चल रहा था। बीच-बीच में पहलवानों को समर्थन देने वाले संगठन और व्यक्ति भी वहां जाकर विरोध-प्रदर्शन करते थे। लेकिन अभी तक सरकार और खेल मंत्रालय की तरफ कोई ऐसी पहल नहीं हुई कि महिला पहलवानों को न्याय की किरण दिखे। उनको जंतर मंतर पर एक बैरिकेड में बांध दिया गया था। रविवार को जिस दिन संसद भवन का उद्घाटन हो रहा था, उस दिन उन्होंने नयी संसद तक मार्च का ऐलान कर दिया। जैसे ही खिलाड़ी और उनके समर्थक जंतर मंतर के बैरिकेड से बाहर निकले इस बैरिकेड्स के बाहर निकलने को पुलिस ने कानून का उल्लंघन माना।
इसके बाद दिल्ली की सड़कों पर दिल्ली पुलिस और पहलवानों के बीच जो जंग हुई उसका गवाह न सिर्फ देश बल्कि दुनिया भी बनीं। संसद की सुरक्षा के नाम पर पुलिस ने जिस तरह से पहलवानों को सड़क पर घसीटते हुए पुलिस वैन में बैठाया, उसके बाद से पहलवानों को सरकार की नीयत पर शक होना लाजिमी है। दिल्ली पुलिस धरना स्थल से पहलवानों के टेंट, चारपाई, चटाई को ट्रक और टैम्पों में लादकर ले गई।
प्रदर्शनकारियों के साथ हुए दुर्व्यवहार की चौतरफा निंदा होते देख दिल्ली पुलिस ने अपना रवैया बदला और पहलवानों के साथ बदसलूकी को जायज ठहराने के लिए तर्क पेश किया। पुलिसिया तर्क के मुताबिक उनके लिए 'संसद भवन के उद्धाटन समारोह की सुरक्षा' सबसे ऊपर थी। पुलिस ने पहलवानों को समझाने की कोशिश की लेकिन वे संसद के समीप महिला महापंचायत के लिए जाने की जिद पर अड़े थे। इसलिए उन्हें हिरासत में लेना पड़ा और दोबारा धरना देने की इजाजत नहीं दी गई। पुलिस ने बजरंग पूनिया, साक्षी मलिक और विनेश फोगट पर दंगा भड़काने, सार्वजनिक संपत्ति का नुकसान करने की एफआईआर भी दर्ज की है।
पुलिस के लिए राष्ट्र के गर्व और गौरव के प्रतीक नये संसद भवन की सुरक्षा से समझौता न करना जरूरी था लेकिन उसी दिल्ली पुलिस के लिए पहलवानों की मांग पर जांच करना जरूरी नहीं लगता। पहलवानों पर जब एफआईआर करना हुआ तो उसने सुप्रीम कोर्ट से किसी गाइडलाइन का इंतजार नहीं किया। लेकिन दिल्ली की सड़कों पर रविवार को जो हुआ उसी का परिणाम है कि अब अंतरराष्ट्रीय कुश्ती संघ सीधे तौर पर इस मामले में शामिल हो गया है।
पुलिस हो या सरकार दोनों को यह भी समझना चाहिए कि संसद की सुरक्षा की तरह जनता की सुरक्षा भी महत्वपूर्ण है। अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त महिला पहलवानों को सड़क पर घसीट करके पुलिस ने लोकतंत्र और मोदी सरकार के साथ-साथ राष्ट्रीय प्रतिष्ठा को भी नुकसान पहुंचाया है।












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