Women Reservation: महिलाओं को टिकट देने से कतराने वाले नेता आरक्षण पर मुखर क्यों?
Women Reservation: मनुष्य जाति की लगभग आधी आबादी महिलाओं की है और आधी पुरुषों की है, इसलिए यदि समाज, राजनीति और अर्थव्यवस्था में भागीदारी की बात की जाए, तो कायदे से महिलाओं और पुरुषों दोनों की भागीदारी आधी-आधी होनी चाहिए। लेकिन क्या इस भागीदारी को सुनिश्चित करने के लिए आरक्षण एक सही और न्यायसंगत तरीका है? क्या सहज, स्वाभाविक और प्राकृतिक तरीके से इस भागीदारी को सुनिश्चित नहीं किया जा सकता?
क्या हमें यह मान लेना चाहिए कि हमारा लोकतंत्र 75 साल बाद भी अपने नागरिकों को सबल बनाने और उन्हें सहज ही अवसरों की समानता मुहैया कराने में विफल साबित हुआ है? क्या अपनी इसी विफलता को छिपाने के लिए आरक्षण जैसे विवादास्पद, विभाजनकारी और नशीले उपचार पर इसकी निर्भरता दिनोंदिन बढ़ती ही जा रही है?

संविधान लागू होते समय आरक्षण वाला जो उपचार एससी-एसटी समुदाय से शुरू हुआ, वह वाया ओबीसी, ईबीसी और ईडब्ल्यूएस आज सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में 50 प्रतिशत के अटूट लगने वाले बांध को भी तोड़ते हुए 59.50 प्रतिशत तक पहुंच चुका है। यानी अब इस देश में 100 में केवल 40 सीटें अनारक्षित बची हैं। इन बची हुई सीटों के लिए भी मारामारी बढ़ती ही जा रही है, क्योंकि ओबीसी समुदाय की तरफ से जातिगत जनगणना और आबादी के हिसाब से आरक्षण दिये जाने की मांग ज़ोर पकड़ने लगी है।
संसद और विधानसभाओं में भी एससी-एसटी के लिए पहले से ही आरक्षण है। अभी देश की 543 सीटों में से 131 सीटें एससी-एसटी समुदाय के लिए आरक्षित हैं। पंचायतों और नगर निकायों में भी 1992 से ही महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू है। बिहार जैसे राज्यों में यह आरक्षण 50 प्रतिशत है। लेकिन इन तमाम आरक्षणों के बावजूद क्या इतने वर्षों और दशकों में किसी भी आरक्षित समुदाय का इतना उत्थान और सबलीकरण हो पाया है कि वे कह सके कि अब उन्हें आरक्षण की ज़रूरत नहीं है?
हमारे लोकतंत्र के नक्कारखाने में तूती की आवाज़ की तरह गूंजते इन्हीं सवालों के बीच संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने की कवायद भी पिछले 27 साल से जारी है, जिसे अंजाम तक पहुंचाने का सौभाग्य प्रचंड बहुमत के पहाड़ पर खड़ी मोदी सरकार के हिस्से में आया है। यद्यपि इस बिल के पास हो जाने के बाद भी अगली जनगणना और परिसीमन के संपन्न होने तक यह लागू नहीं हो पाएगा, लेकिन यह हमारे लोकतंत्र और राजनीतिक दलों की मंशा पर सवाल खड़े करने की घड़ी तो है ही।
यहां यह बात समझने की है कि जब हम संसद और विधानसभा की एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित कर देंगे, तो उन सीटों पर पुरुषों को चुनाव लड़ने से रोक दिया जाएगा, जो कि स्पष्ट रूप से उनके साथ लिंग के आधार पर भेदभाव होगा। यह अलग बात है कि संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 में अलग-अलग संदर्भों में साफ तौर पर कहा गया है कि राज्य किसी भी नागरिक के विरुद्ध केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्म स्थान या इनमें से किसी के आधार पर कोई विभेद नहीं करेगा।
लेकिन राज्य जब किसी खास वर्ग या समुदाय के सशक्तीकरण के नाम पर तुष्टीकरण की राजनीति से प्रेरित होकर इस तरह के आरक्षणों का प्रावधान करता है, जो अन्य वर्गों और समुदायों के नागरिकों के चुनाव लड़ने के अधिकार को ही खत्म कर देता है, तो स्पष्ट रूप से वह उन वर्गों और समुदायों के साथ विभेद कर रहा होता है। इस विभेद के लिए वह आरक्षित वर्गों को अवसर की समानता मुहैया कराने के तर्क की आड़ लेता है, लेकिन एक को अवसर मुहैया कराने के लिए दूसरे के अवसर छीनने से लोकतंत्र में न्याय कैसे सुनिश्चित होगा?
एक और बड़ा सवाल यह कि किसी खास लोकसभा या विधानसभा सीट को महिलाओं या किसी खास वर्ग के लोगों के लिए आरक्षित तो कर दिया जाएगा, लेकिन उस सीट पर केवल महिलाएं या उस खास वर्ग के लोग ही तो नहीं होते कि उस सीट का प्रतिनिधित्व करने का अधिकार अनिवार्य रूप से उन्हें ही दे दिया जाना चाहिए। संभव है कि वहां मतदाताओं का एक समूह भी आरक्षित वर्गों के उम्मीदवारों से इतर किसी अन्य व्यक्ति को अपने प्रतिनिधि के रूप में देखना चाहता हो, लेकिन हम उनके सामने कोई विकल्प ही नहीं छोड़ रहे। ज़ाहिर है, इससे मतदाताओं की भी आकांक्षाओं और अधिकारों का दमन होता है।
क्या यह बेहतर नहीं होता कि इस तरह के 'असंवैधानिक' उपायों को 'संविधानसम्मत' होने का जामा पहनाने की बजाय राजनीतिक दल स्वयं एक पहल करते और लोकसभा एवं विधानसभा के चुनावों में कम से कम 33 प्रतिशत महिला उम्मीदवार खड़े करते? आखिर जब लगभग सभी राजनीतिक दल संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने पर सहमत हैं ही, तो उन्हें महिला उम्मीदवारों को टिकट देने से किसने रोका है?
यदि वे महिलाओं के इतने ही बड़े हितैषी हैं, तो वे 33 प्रतिशत तो क्या, 50 प्रतिशत महिलाओँ को टिकट दे सकते हैं। इससे किसी का अधिकार भी नहीं मारा जाता और महिलाओं का सशक्तिकरण भी हो जाता। और अगर राजनीतिक दल स्वेच्छा से ऐसी पहल नहीं करते, तो लोकसभा और विधानसभा सीटों को आरक्षित करने के बजाय एक बाध्यकारी कानून राजनीतिक दलों के लिए बनाया जाता, जिससे कि वे कम से कम एक तिहाई टिकट महिलाओं को देने के लिए बाध्य होते। अगर ऐसा हो सकता, तो किसी पुरुष को चुनाव लड़ने से रोके बिना ही संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व अपने आप बढ़ जाता।
यहां एक बात और भी महत्वपूर्ण है कि आज महिलाएं बिना किसी आरक्षण के स्वयं अपनी ही योग्यता से तमाम क्षेत्रों में आगे बढ़ रही हैं। क्या यह तथ्य नहीं है कि बिना किसी आरक्षण के ही हमारी बहन-बेटियां आईएएस, जेईई और एनआईआईटी समेत तमाम प्रतियोगी परीक्षाओं में टॉपरों की सूची में अग्रणी रहती हैं। क्या यह भी तथ्य नहीं है कि बिना किसी आरक्षण के ही अनेक महिलाओं ने इसरो जैसी अग्रणी अंतरिक्ष एजेंसियों में भी अपनी जगह बना ली है, जिनकी योग्यता का लोहा चंद्रमा पर चंद्रयान की सफल लैंडिंग के साथ पूरी दुनिया ने माना है? और तो और, बिना किसी आरक्षण के ही महिलाएं इस देश में प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति भी बन चुकी हैं। इसलिए क्या सचमुच आज महिलाओं के उत्थान के लिए आरक्षण की ज़रूरत है भी? या फिर कहीं इस आरक्षण के ज़रिए हमारे राजनीतिक दल अपने ही उत्थान के बारे में तो नहीं सोच रहे?
सवाल यह भी है कि महिला आरक्षण लागू होने के बाद अपने उत्थान की चिंता में डूबी राजनीतिक पार्टियां किन महिलाओं को टिकट देंगी? क्या आम महिलाओं को या फिर ज्यादातर नेताओं की ही बहन-बेटियों, पत्नियों और पुत्रवधुओं को? अब तक के अनुभव से तो यह भी लगता है कि कुछ टिकट उन सज़ायाफ्ता नेताओं के परिवार की महिलाओं को भी बांट दिया जाएगा, जो चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित हो चुके होंगे। कहने का आशय यह कि यदि राजनीतिक दलों ने सही उम्मीदवारों को टिकट नहीं दिये, तो भी महिला आरक्षण अपने उद्देश्य में असफल हो जाएगा और सशक्तिकरण के बजाय यह तुष्टीकरण की एक सामान्य कवायद बनकर रह जाएगा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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