Mahua Moitra: क्या सुप्रीम कोर्ट महुआ को भी बचाने की कोशिश करेगा?

महुआ मोइत्रा संसदीय परंपराओं में विश्वास रखती होती, तो इस तरह की चिठ्ठी नहीं लिखती। हालांकि उनकी यह आपत्ति एकदम जायज है कि जब उन्होंने कमेटी को चिठ्ठी लिख कर 4 नवंबर के बाद बुलाने की गुहार लगाई थी, तो एथिक्स कमेटी को उनका आग्रह स्वीकार करके उन्हें 5 नवंबर के बाद ही बुलाना चाहिए था।

एथिक्स कमेटी ने 31 अक्टूबर के बजाए उन्हें 2 नवंबर को पेश होने के लिए कहा। तीन दिन में कोई पहाड़ नहीं टूट जाता, अगर एथिक्स कमेटी उन्हें 2 की बजाए 5 नवंबर को बुला लेती। इतनी बात तो अदालत भी मान लेती है। लेकिन अब जिस तरह की चिठ्ठी महुआ मोइत्रा ने एथिक्स कमेटी को लिखी है, वह पूरी तरह गलत है।

 Will the Supreme Court try to save Mahua Moitra

यह घमंड की परकाष्ठा है कि महुआ मोइत्रा ने लोकसभा की एथिक्स कमेटी के अधिकार क्षेत्र पर ही सवाल उठा दिया है। उन्होंने एथिक्स कमेटी के अध्यक्ष को चिठ्ठी लिख कर कहा है कि संसदीय समितियों को आपराधिक मामलों में जांच का कोई अधिकार नहीं है, अपराधिक मामलों की जांच सिर्फ जांच एजेंसियां ही कर सकती हैं। यह वही महुआ मोइत्रा है, जो कल तक गौतम अडानी पर आरोप लगा कर संयुक्त संसदीय समिति से जांच करवाने की मांग कर रही थीं।

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संयुक्त संसदीय समिति में कौन सी विशेज्ञता होती है कि वे औद्योगिक घरानों की आपराधिक गतिविधियों की जांच कर सके। वह संसदीय व्यवस्था पर ही सवाल उठा रही हैं। उनका कहने का मतलब यह है कि अब तक जितनी भी संयुक्त संसदीय समितियां बनी, या जितनी भी एथिक्स कमेटी की सिफारिशें हुई, वे सब गलत थी। तो क्या वह यह भी कहना चाहती हैं कि 2005 में जिन दो एथिक्स कमेटियों ने ग्यारह सासंदों की सदस्यता खत्म करने की सिफारिश की थी, वह भी गलत थी।

असल में महुआ को डर सता रहा है कि उनकी लोकसभा सदस्यता जाने वाली है, क्योंकि खुद पर लगाए गए आरोपों में से ज्यादातर उन्होंने एथिक्स कमेटी के सामने जाने से पहले ही कुछ टीवी चेनलों को दिए इंटरव्यू में कबूल कर लिए हैं। अभी कुछ और बातें भी सामने आ रही हैं, जैसे उन्होंने बिना लोकसभा सचिवालय को सूचित किए दुबई की 47 यात्राएं की थीं। इन 47 यात्राओं के टिकटों का मामला भी सामने आ रहा है, जो कथित तौर पर उनके अकाऊंट से नहीं खरीदी गई थीं।

उनकी ताज़ा चिठ्ठी इस बात का संकेत है कि उन्हें संसद से बर्खास्त किए जाने की सिफारिश का अंदेशा है। इसलिए उन्होंने एथिक्स कमेटी पर हमलावर रूख अपना लिया है। एथिक्स कमेटी को लिखी चिठ्ठी में उन्होंने उनके खिलाफ हल्फिया बयान देने वाले दर्शन हीरानन्दानी के सामने बैठ कर काउन्टर सवाल किए जाने की इच्छा जताई है।

यह एक ऐसी इच्छा है कि अगर एथिक्स कमेटी उनकी यह मांग पूरी नहीं करती, तो उनके सुप्रीमकोर्ट जाने का रास्ता खुलेगा। पर बड़ा सवाल यह है कि क्या कपिल सिब्बल या कोई अन्य बड़ा वकील महुआ मोइत्रा को सुप्रीमकोर्ट से राहत दिला पाएगा? 2005 में जब संसद से प्रस्ताव पास करके 11 सांसदों की सदस्यता खत्म की गई थी, तो वे सुप्रीम कोर्ट गए थे। उनकी तरफ से वैसे तो प्राणनाथ लेखी प्रमुख वकील थे, लेकिन एक बार राम जेठमलानी भी पेश हुए थे। चीफ जस्टिस वाई.के. सब्बरवाल की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय पीठ ने सुनवाई की थी। पीठ में तीन बनाम दो जजों के बहुमत के आधार पर सुप्रीमकोर्ट ने सांसदों की याचिका अस्वीकार कर दी थी।

एक तरह से सुप्रीमकोर्ट की पांच सदस्यीय बेंच यह स्वीकार कर चुकी है कि संसद को अपने सदस्य को बर्खास्त करने का अधिकार है। हालांकि इससे पहले भी तीन सांसद बर्खास्त किए जा चुके थे। सबसे पहले 1951 में कांग्रेस के सांसद एच. जी. मुद्गल को पैसे लेने के आरोप में, 1976 में आपातकाल के दौरान सुब्रहमन्यम स्वामी को देश विरोधी प्रोपेगंडा के आरोप में (हालांकि वह भारत में लगाए गए आपातकाल के खिलाफ मोर्चा खोले हुए थे), 1977 में इंदिरा गांधी की सदस्यता खत्म की गई थी। 2005 में लोकसभा के दस और राज्यसभा के एक सांसद के बाद 2016 में विजय माल्या की सदस्यता भी प्रस्ताव पास करके खत्म की जा चुकी है।

जिस समय सुप्रीमकोर्ट ने लोकसभा और राज्यसभा से बर्खास्त 11 सांसदों की याचिका सुनवाई के लिए स्वीकार की थी, उस समय लोकसभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी ने देश के सभी स्पीकरों की कांफ्रेंस बुला ली थी, जिसमें विधायिका के कार्यों में सुप्रीमकोर्ट के दखल की आलोचना की गई थी। सदन में भी उन्होंने बोला था कि वह किसी कोर्ट को संसदीय कामकाज में दखल नहीं देने देंगे, वह बिलकुल परवाह नहीं करते।

स्पीकरों की बैठक में हालांकि छतीसगढ़ विधानसभा के स्पीकर प्रेम प्रकाश पांडे ने कहा था कि सांसदों को बर्खास्त करने का संसद का निर्णय जल्दबाजी में किया गया गलत निर्णय है। लोकसभा में जब प्रस्ताव पास किया जा रहा था उस समय विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवानी ने कहा था कि अपराध के मुकाबले यह सजा बहुत ज्यादा है। भाजपा ने बर्खास्तगी के खिलाफ वाकआउट भी कर दिया था, हालांकि बर्खास्त किए गए 10 लोकसभा सदस्यों में से तीन बीएसपी के, एक सपा का और एक कांग्रेस का सदस्य था।

लोकसभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी उन दस सांसदों को बर्खास्त करने को जिद्द पर अड़े थे, जबकि तब कपिल सिब्बल केंद्र में मंत्री थे और वह भी उन 11 सांसदों की बर्खास्तगी के पक्ष में थे, जिनमें से दस सांसदों ने ऐसा एक भी सवाल लोकसभा या राज्यसभा में लगाया ही नहीं था, जिसके लिए उन्हें तथाकथित रूप से पैसे लेते हुए स्टिंग ऑपरेशन में गुप्त कैमरे में रिकॉर्ड किया गया था। सिर्फ स्टिंग आपरेशन के आधार पर उनको बर्खास्त कर दिया गया।

उनमें से एक सांसद राजाराम पाल ने लिख कर दिया हुआ था कि उनके नाम से लगाया गया उपरोक्त सवाल उन्होंने अपने दस्तखत से दाखिल नहीं किया था। स्टिंग आपरेशन भी पूरी तरह प्रायोजित था, जिसे अनिरुद्ध बहल की कोबरा डॉट कॉम ने 48 लाख रूपए में आजतक को बेच दिया था। आजतक ने खुद एथिक्स कमेटी के सामने आकर यह कबूल किया था कि उसने स्टिंग ऑपरेशन का वीडियो अनिरुद्ध बहल से 48 लाख रूपए में खरीदा।

वह स्टिंग आपरेशन केवल पैसा कमाने के उद्देश्य से किया गया था, उसमें कोई सवाल लोकसभा या राज्यसभा में पूछा ही नहीं गया था। उसमें कैश फार क्वेश्चन का मामला बनता ही नहीं था। लेकिन महुआ मोइत्रा तो खुद कबूल कर चुकी हैं कि उन्होंने संसद के पोर्टल में लॉगिन के लिए अपना पासवर्ड दर्शन हीरानंदानी को दिया था, वह उनकी दी गई हवाई टिकटों पर विदेश यात्राएं करती थीं, उनसे महंगे गिफ्ट लेती थी।

दर्शन हीरानन्दानी ने कहा है कि महुआ आए दिन कोई न कोई डिमांड रखती रहती थी। उनके सवाल लोकसभा की वेबसाईट पर दर्शन हीरानन्दानी का स्टाफ लोड करता था। लेकिन जैसे ही संसद प्रस्ताव पास करके महुआ मोइत्रा की सदस्यता खत्म करेगी, वह सुप्रीमकोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगी। लेकिन क्या सुप्रीम कोर्ट महुआ मोइत्रा को बचाने में सफल होगा?

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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